Friday, 28 October 2016

तुम्हारे इसी जज्बे से महफ़हूज हमारी हर होली-दीवाली (सैनिकों को समर्पित )




तन-मन धन से बेपरवाह देश  की करते हो तुम रखवाली। 
तुम्हारे इसी जज्बे से महफ़हूज हमारी हर होली-दीवाली।।
खुद के घर मने या न मने ईद या नानक जयंती। 
तुमने तो कसम खाई शत्रु मुक्त रहे देश की धरती।।
जाड़ा,गर्मी,बरसात या हो विपदाएं असंख्य,अनोखी। 
रहा तुम्हारा सदा ही एक लक्ष्य,राष्ट्र रहे सदा सुखी।।
माँ-बाप,भाई-बहन,पत्नी सुख की दी तुमने कुर्बानी।
हम सब चिर ऋणी तुम्हारे,ओ भारत वीर सेनानी।।

Sunday, 2 October 2016

राम नाम अनमोल मन्त्र है



राम नाम अनमोल मन्त्र है 
सरल-सहज आसान जाप है 
पर मुख से जो न निकले तो 
मानव जन्म धिक्कार बड़ा है। 

भाव-कुभाव सतत जपना है 
जीवन अपना सफल करना है 
वरना शत आयु रही भी तो 
यूँ ही आना-जाना लगा रहना है। 

निर्मल करता राम नाम है 
तन-मन का उद्धार काम है 
सोच-विचार बहुत क्या करना 
जग का मूल राम नाम है। 

राम-राम कह सबसे मिलना है 
राम-राम कह जग से जाना है 
राम तत्व की महिमा जानी तो 
राम स्वरुप ही हो जाना है। 

Friday, 30 September 2016

नवरात्रि की इस शुभ बेला पर झूम उठी ये सृष्टि सारी

नवरात्रि की इस शुभ बेला पर झूम उठी ये सृष्टि सारी 
माँ शारदा,लक्ष्मी,काली की गूँज उठी देखो किलकारी। 
सत,रज,तम और वात,पित्त,कफ के सन्तुलन की है तैयारी 
नव-दिन में तन-मन साधन की,साधक में होती है बेकरारी।
नवदुर्गा के नवरूप मनोहर,नवधा भक्ति की है बलिहारी 
अंबे-अंबे पार लगा इस भवसागर से,ये भाव बहे संचारी। 
तंत्र-मन्त्र,यज्ञ-दान और कहीं जगराते की होती है तैयारी 
माँ तो है करुणा की देवी,एक पुकार सबकी लाज संवारी।
श्री,समृद्धि,शक्ति,शांति की ,घर-घर बहे बयार हितकारी 
निश्छल नतमस्तक हों देवी के आगे तो मिटें कामना सारी।   

रायबहादुर बहुत होते थे बिरतानि शासनकाल में


रायबहादुर बहुत होते थे बिरतानि शासनकाल में 
लेकिन पाए जाते हैं अब भी हिंदुस्तान की धरती में। 
लूट-खसोट,छल-छद्म भरते जो अधिकारी के कानों में 
अपना उल्लू सीधा करने,तिकडम करते हर हाल में। 
जो सत्ता या इनका विरोधी हो,मार फेंकते कोने में 
लाज-शरम कहाँ भरती है,इन बेपैंदे के लोटों में। 
कोई मरे तो मरा करे,बला से इनके ठेंगे में 
ये तो बस अपने गुन गाते या जो हों सरकार में।
दाने-दाने को हो मुहताज,मांगें भीख जो गलियों में 
उनसे इन्हें नहीं वास्ता,ये तो मस्त जश्न मनाने में। 
लेकिन जनता त्रस्त बहुत जो छुपे भेदी नर खालों में 
मार-पीट और ठोक-बज कर लेगी बदला हर हाल में।  


Wednesday, 28 September 2016

माँ तेरे जगराते का आडम्बर करते कुछ लोग हैं


माँ तेरे जगराते का आडम्बर करते कुछ लोग हैं 
महंगे-महंगे झाड़-फानूसों से करते सजावट भव्य हैं।
हलुवा-पूरी,खीर-मलाई चट कर जाते सब भोग हैं  
सच्चे भक्तों को लेकिन तेरे,रूखा-सूखा देते शेष हैं। 
वी.वी.आई.पी,वी.आई.पी सुविधा करते खूब प्रबंध हैं
लेकिन निर्धन के भीतर आने पर करते बड़ा ज़लील हैं। 
माएं तो सबकी बस माँ होती हैं,करती कहाँ विभेद हैं 
लेकिन तेरी आड़ में भीतर-भीतर करते छल-प्रपंच हैं। 
महिला महिमा मंडन का बात-बात पर करते रहते शोर हैं 
माँ-बहनों संग व्यवहार मगर करते दुःशाशन का रोल हैं।
दुर्भाग्य बड़ा कि अब कुछ माँ-बहने भी करती बड़ा किलोल हैं 
इज़्ज़त से अपनी खुद ही खिलवाड़ करती रहती हर रोज़ हैं। 
जगदम्बे रौद्र रूप की तेरे अब हम सबको दरकार हैं 
भेद,अज्ञान मिटा दे इनका,नित करते यही गुहार हैं।
स्नेह,प्यार,दया और करुणा,मानव की असली पहचान हैं 
सरल,सहज जीवन जीने में सबके ही कल्याण निहित हैं।   

Monday, 26 September 2016

#शिवोहम (निर्वाणषट्कम #शंकराचार्य जी रचित का अनुवाद)-- शिव,शिव और शिव ही एक स्वीकार

न तो हूँ मैं मन,बुद्धि,चित्त,अहंकार 
न तो हूँ मैं स्वाद,घ्राण,दृश्य,गंधाधार 
न तो हूँ मैं व्योम,तेज़,वायु,अग्नि आकार 
मैं तो हूँ सदा-सदा ही आनंदागार
शिव,शिव और शिव ही एक स्वीकार।।१।।

न तो हूँ मैं प्राणाधार,न ही वायु पञ्च प्रकार 
न तो हूँ मैं  सप्त धातु,न ही पञ्च कोषागार 
न तो हूँ मैं पंचेंद्री ज्ञान,न ही पंचेंद्री कर्मविकार
मैं तो हूँ सदा-सदा ही आनंदागार
शिव,शिव और शिव ही एक स्वीकार।।२।।

न तो हूँ मैं राग-द्वेष,न ही लोभ,मोहाकार 
न तो हूँ मैं ईर्ष्या और न ही अहंकार 
न तो हूँ मैं धर्म,अर्थ न ही काम,मोक्षाकार 
मैं तो हूँ सदा-सदा ही आनंदागार
शिव,शिव और शिव ही एक स्वीकार।।३।।

न तो हूँ मैं पुण्य,पाप न ही सुख,दुःखागार
न तो हूँ मैं मन्त्र,तीर्थ न ही वेद,यज्ञाधार
भोजन भी नहीं हूँ मैं और न भोक्ता या उपभोग्यआगार   
मैं तो हूँ सदा-सदा ही आनंदागार
शिव,शिव और शिव ही एक स्वीकार।।४।।

न ही मुझमें डर-भय ,न ही जाति-भेद प्रकार 
न ही माता-पिता और न ही जन्म लेता आकार 
न ही कोई बंधु-बांधव न ही गुरु-शिष्य प्रकार 
मैं तो हूँ सदा-सदा ही आनंदागार
शिव,शिव और शिव ही एक स्वीकार।।५।।

मैं तो हूँ सदा-सदा ही निर्विकल्प और निराकार 
सभी इन्द्रियों की ममता से परे है मेरा आकार 
न ही हूँ मैं बंधन में और न ही मुक्ति विचार 
मैं तो हूँ सदा-सदा ही आनंदागार
शिव,शिव और शिव ही एक स्वीकार।।६।।


शिवोहम शिवोहम 
शिवोहम 




  
   


Saturday, 24 September 2016

संत की मुस्कान



संत की मुस्कान की बात ही कुछ और है 
खिले गदराए गुलाब की बात ही कुछ और है। 
सात्विक,सरल,सहज मुस्कान की बात ही कुछ और है 
भोली,मृदुल,निश्छल मुस्कान की बात ही कुछ और है। 
वो रोता हो,क्रोधित हो या पीड़ा में दिखता हो 
पर देख सको तो देखो उसमें भी मुस्कान छिपी है।
हलके,मंद-मंद या ठहाके से अट्टहास तक 
उसकी मुस्कान एक,हम सब पर भारी है। 
जिस पर उसकी बांकी मुस्कान कटार पड़ी है 
वो तो खो अपनी सुध-बुध बावली ही फिरती है।