लेकिन मरना भी,कहां कहो रहा आसान।।
हर हाल यहां तो,जद्दोजहद रहती है भारी।
जाने कौन घड़ी,टूट पड़े अपना स्वाभिमान।
माटी की यह देह बनी,माटी में मिल जानी।
फिर न जाने क्यों इस पर,लाख टके गुमान।।
ठोकर पग-पग पर,जाने कितनी लगती रहती।
मगर होश में बमुश्किल ही,आ पाता है इंसान।।
हां करम को करते,करें न हम अभिमान यदि।
अविरल बहे तब ये जीवन,मदद करे भगवान।।
नलिन "तारकेश"
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