Tuesday, 8 September 2026

कविता (८/९/२६)

पगले यहां धरती,नहीं जीना जरा आसान।
लेकिन मरना भी,कहां कहो रहा आसान।।
हर हाल यहां तो,जद्दोजहद रहती है भारी।
जाने कौन घड़ी,टूट पड़े अपना स्वाभिमान।
माटी की यह देह बनी,माटी में मिल जानी।
फिर न जाने क्यों इस पर,लाख टके गुमान।।
ठोकर पग-पग पर,जाने कितनी लगती रहती। 
मगर होश में बमुश्किल ही,आ पाता है इंसान।।
हां करम को करते,करें न हम अभिमान यदि।
अविरल बहे तब ये जीवन,मदद करे भगवान।।

नलिन "तारकेश"

No comments:

Post a Comment