Saturday, 15 August 2026

६८५: ग़ज़ल १५/८/२०२६

माटी का मोल,अनमोल कहां समझते हैं लोग।
चिकनी टाईल्स पर जबसे चलने लगे हैं लोग।।

देश की खातिर बलिदान की बातें कौन कहे।
वंदेमातरम् कहने से ही जब कतराते हैं लोग।।

झंडा फहराने की बातें भी सब अब इसलिए हैं।
सोशल मीडिया-सेल्फी की होड़ में जुटे हैं लोग।।

सुभाष,चंद्रशेखर,बिस्मिल थे कभी भारत के हीरो।
सुन कौमी तराने जेनजी के कोमा में पड़े हैं लोग।।

तालीम ही जब बांटने की दे रहे नाम़ाकूल "उस्ताद"।
कोढ़ में खाज़ की‌ बेवजह शिकायत करते हैं लोग।।

नलिन"उस्ताद"

Thursday, 13 August 2026

६८४: ग़ज़ल: १३/८/२०२६

अंधकार हुआ जबसे नसीब अपना क्या करें।
कमबख्त दिल है जब ग़म से बुझा क्या करें।।

चले तो हम हर एक डगर उसे तलाशने को।
मंजिल को ही नहीं गया जो रास्ता क्या करें।।

चातक,पपीहा,मोर बेबस ताकते हैं आसमां।
जो सावन-भादो ही न बरसें बदरा क्या करें।।

हर तरफ़ शोर ही शोर है काग़ज़ी इंकलाब का।
असल ज़मीं कोई खड़ा नहीं दिखता क्या करें।।

तबीयत नासाज है कुछ आजकल "उस्ताद" की। 
उठा रहे हैं उसका लोग फायदा बता क्या करें।।

नलिन "उस्ताद" 

Monday, 3 August 2026

६८३: ग़ज़ल (३/८/२६)

ये एक दिन और फिर पारे की तरह फिसल गया।
ख्वाब तो अश्क बन आंखों से मेरा निकल गया।।

सूद की खातिर दिया था जिसे मैंने प्यार कभी।
उसका हो हिसाब क्या,जब चला असल गया।।

रपटीली राहे ज़िन्दगी में बार-बार फिसलने को था।
खुदा का शुक्र रहा जो हर बार लेकिन संभल गया।

क्या कहें जो बात थी उसकी मासूमियत में जनाब।
देखा जो दिल ने बस एक बार,और वो मचल गया।

जिसका अक्स दिले आईने में संजोए थे "उस्ताद"।
बेरहम वक्त के हाथों वो भी देखो ओझल हो गया।।

नलिन "उस्ताद"