Tuesday, 8 September 2026

कविता (8 /9/ 26)

रोने से मन हल्का तो थोड़ा होगा।
पर इससे भी हल क्या कुछ होगा।।

जो रचा है विधान साईं ने अपने।
वह तो हमें हर हाल भोगना होगा।।

उसने भी तो मार करके मन अपना। 
नियति से हार,कालदंड लिखा होगा।।

अब तो जो भी सम्मुख सच है आया।
उस सबको तो हमने सहना ही होगा।।

मन को अपने समझा-बुझा,जैस-तैसे।
हर हाल मिलकर हौसला रखना होगा।।

समय लेगा अवश्य कड़ी परीक्षा अपनी।
पर जीवन को तो हंसते हुए जीना होगा।।

नलिन "तारकेश" 

कविता (८/९/२६)

पगले यहां धरती,नहीं जीना जरा आसान।
लेकिन मरना भी,कहां कहो रहा आसान।।
हर हाल यहां तो,जद्दोजहद रहती है भारी।
जाने कौन घड़ी,टूट पड़े अपना स्वाभिमान।
माटी की यह देह बनी,माटी में मिल जानी।
फिर न जाने क्यों इस पर,लाख टके गुमान।।
ठोकर पग-पग पर,जाने कितनी लगती रहती। 
मगर होश में बमुश्किल ही,आ पाता है इंसान।।
हां करम को करते,करें न हम अभिमान यदि।
अविरल बहे तब ये जीवन,मदद करे भगवान।।

नलिन "तारकेश"

Thursday, 3 September 2026

६८७: ग़ज़ल: (३/९/२६)

ऐसा नहीं कि वो मुझे कतई चाहता नहीं है।
बस इतना है कि लफ़्ज़ों से कहता नहीं है।।

यकीं कर उस पर यहां तक आ तो गया हूं।
आगे का रास्ता मगर कोई दिखता नहीं है।।

प्यार,इश्क,मोहब्बत है बड़ी ही खूबसूरत शय।
जाने क्यों कोई फ़िर इजहार ये करता नहीं है।।

बटोरने में फूल कांटे चुभेंगे तो जरूर उंगली में।
महकी पर हथेली जो कोई उससे डरता नहीं है।।

कहते तो हैं मेरे सामने सब "उस्ताद" मुझको। 
पीठ पीछे कोई भी मगर ऐसा मानता नहीं है।।

नलिन "उस्ताद" 



६८६: ग़ज़ल (२४/८/२६)

जाने क्यों आईने से ही नज़रें चुराता है आदमी।
झूठ तो एक रोज बेनकाब कर देता है आदमी।।

हवा में कुलांचे भरने का हुनर तो बहुत अच्छा है।
जिद में मगर संपाती सा पंख जलाता है आदमी।।

मां-बाप,दोस्त सब आख़िर दर्द बांटने को ही हैं।
छुपन-छुपाई मगर उनसे भी खेलता है आदमी।।

गलतियां तो जाने-अनजाने हो जाती हैं सभी से।
सबक उनसे न सीखे तो अक्सर रोता है आदमी।।

जख्म कुरेदे कोई तो दर्द होना लाजमी है "उस्ताद"।
दाई से ही मगर पेट क्यों छुपाना चाहता है आदमी।

नलिन "उस्ताद"

Tuesday, 1 September 2026

सादर श्रद्धा-सुमन "रब्बू" दा

सादर श्रद्धा-सुमन "रब्बू" दा
################
पंचतत्व में हुई विलीन रब की खुशबू*आज।(रब्बू)
रीता-घट यह मेरा हुआ,मौन हो गया साज़।।

जाने कितनों को कृपा दिलाई मां महाराज के हाथ।
दु:ख में अपने छोड़ा लेकिन,कभी न गुरु का साथ।

हंसते,रोते,झूमते दिल में पैठ रही यही एक बात।
श्रीचरण युगल सरकार के करते सदा करामात।।

शहंशाह की तरह गुज़ारी,कंगाली की हर रात।
मिली जो शानो-शौकत तो,खूब लुटाई सौगात।।

बाबा नीबकरौरी का मिला आपको,अल्प-आयु सानिध्य।
देश विदेश जाने कहां-कहां,किए हनुमत काज वैविध्य।।

सिद्धि मां और जीवंती के आप बने,अत्यंत लाड़ले लाल।
मां-महाराज चरित्र लिख वर्णित किया,अद्भुत-बेमिसाल।।


अपने प्रभु श्रीराम से करते,हम सब यही दरकार।
भवसागर से इस भगत को पार लगा दें सरकार।।

"नलिन" न कुम्हलाए आपका,यही आपसे आस।
नील गगन से इसको देना,अपना सा ब्रह्मोल्लास।।


अनुज
नलिन "तारकेश"


Saturday, 15 August 2026

६८५: ग़ज़ल १५/८/२०२६

माटी का मोल,अनमोल कहां समझते हैं लोग।
चिकनी टाईल्स पर जबसे चलने लगे हैं लोग।।

देश की खातिर बलिदान की बातें कौन कहे।
वंदेमातरम् कहने से ही जब कतराते हैं लोग।।

झंडा फहराने की बातें भी सब अब इसलिए हैं।
सोशल मीडिया-सेल्फी की होड़ में जुटे हैं लोग।।

सुभाष,चंद्रशेखर,बिस्मिल थे कभी भारत के हीरो।
सुन कौमी तराने जेनजी के कोमा में पड़े हैं लोग।।

तालीम ही जब बांटने की दे रहे नाम़ाकूल "उस्ताद"।
कोढ़ में खाज़ की‌ बेवजह शिकायत करते हैं लोग।।

नलिन"उस्ताद"

Thursday, 13 August 2026

६८४: ग़ज़ल: १३/८/२०२६

अंधकार हुआ जबसे नसीब अपना क्या करें।
कमबख्त दिल है जब ग़म से बुझा क्या करें।।

चले तो हम हर एक डगर उसे तलाशने को।
मंजिल को ही नहीं गया जो रास्ता क्या करें।।

चातक,पपीहा,मोर बेबस ताकते हैं आसमां।
जो सावन-भादो ही न बरसें बदरा क्या करें।।

हर तरफ़ शोर ही शोर है काग़ज़ी इंकलाब का।
असल ज़मीं कोई खड़ा नहीं दिखता क्या करें।।

तबीयत नासाज है कुछ आजकल "उस्ताद" की। 
उठा रहे हैं उसका लोग फायदा बता क्या करें।।

नलिन "उस्ताद"