बातें क़सम से वो पुरानी अब तो होने से रहीं कभी।।
तुझे भूलने की बात कही डंके की चोट पर सबसे।
याद आ ही जाती है मगर भूले-बिसरे कभी-कभी।
माना उम्र इजाजत देती नहीं बरसात में भीगने की।
तमन्नाएं थिरकने से पांव को रोक पाती नहीं कभी।।
ये शानो-शौकत,माल-असबाब के पीछे भागे आदमी।
बताओ मगर क्या यहां से ले जा पाए कुछ भी कभी।।
माना तू है बड़ा काबिल,ज़हीन नामचीन "उस्ताद"।
ज्यादा गणित लगाने से भी बात बनती नहीं कभी।
नलिन "उस्ताद"