Monday, 27 July 2026

६८१: ग़ज़ल: २७/७/२६

दर्दे दिल की दास्तां कहो कब‌ तक सुनाएं।
चलो किसी और के घाव में मरहम लगाएं।।

जो गम हमबिस्तर हो चुका है अब हमारे। 
कुछ करें कि किसी और को न वो सताए।।

जो बरसात न होए सावन के महीने मेंतो।
आंखों से चलो हम अपनी ही आंसू बहाएं।।

तुम आ सको तो आ जाना अगर दिल करे। 
अब कब तलक हम राह में आंखें बिछाएं।।

थक गए हैं बेरुखी से जिंदगी की अब तो हम।
बेवजह फिर कब तलक और पतवार चलाएं।।

दुनिया का चलन तो सदा बेहयाई का रहा है।
भला फिर उस पर "उस्ताद" क्यों सिर खपाएं।।

नलिन "उस्ताद"

Thursday, 23 July 2026

ग़ज़ल: ६८० (२३/७/२०२६)

अब यार तू आए या न आए चौखट पर मेरी कभी।
बातें क़सम से वो पुरानी अब तो होने से रहीं कभी।।

तुझे भूलने की बात कही डंके की चोट पर सबसे।
याद आ ही जाती है मगर भूले-बिसरे कभी-कभी।

माना उम्र इजाजत देती नहीं बरसात में भीगने की।
तमन्नाएं थिरकने से पांव को रोक पाती नहीं कभी।।

ये शानो-शौकत,माल-असबाब के पीछे भागे आदमी।
बताओ मगर क्या यहां से ले जा पाए कुछ भी कभी।।


माना तू है बड़ा काबिल,ज़हीन नामचीन "उस्ताद"।
ज्यादा गणित लगाने से भी बात बनती नहीं कभी।

नलिन "उस्ताद" 

Saturday, 18 July 2026

६७९: ग़ज़ल (१८/७/२७)

दुआएं दी मैंने जिसे बद्दुआ उसे दूं भला कैसे। दिल तोड़ने की मगर फिर उसे दूं सजा कैसे।।

खेतों से मेंढ़ें तो सब हटाते दिख रहे हैं लोग।
फसल बर्बाद हो रही तो अब कोसना कैसे।।

सही वक्त है और लोहा भी लाल‌‌ गरम दिख रहा। हो भला ज़र्ब* हथौड़े का तो उसपे सोचना कैसे।।
*प्रहार 
दिले सागर प्यार का ज्वार भाटा जो उठ गया तो। 
कहिए पूनम का चांद देखना छोड़ना होगा कैसे।।

मतवालों की बस्ती में लीजिए "उस्ताद" भी आ गया। 
दुनियावी रवायतों को अब कौन संभाल सकेगा कैसे।।
नलिन "उस्ताद" 


६७८: ग़ज़ल (१६/७/२६)

मुझको भूल जाने की जो धमकी देता है अक्सर।
वो मेरी याद में क़सम से डूबा मिलता है अक्सर।।

खोटा सिक्का कह के जिसे नकारते हैं घरवाले।
लाचार उन्हीं सांसों का सहारा बनता है अक्सर।।

थपेड़ों में ज़िन्दगी के जिसके खातिर जद्दोजहद की।
देखा बहुत बार वो अपने करीब ही मिलता है अक्सर।।

काले घने बादल जो मंडरा के गरजते हैं छत पर।
शोख हवा के इशारे से रास्ते बदल देता है अक्सर 


उंगली पकड़ जिसे सिखाया था चलना हर कदम। बन "उस्ताद" हमारा सबसे मिलवाता है अक्सर।।

नलिन "उस्ताद" 

Wednesday, 15 July 2026

६७७: ग़ज़ल (१५/७/२६) उसकी वफ़ा का

उसकी वफ़ा का बता कैसे मैं यकीं कर लूं।  

ये पांव क्यों अपना दलदली जमीं कर लूं।।


चेहरे से तो वो सच में बड़ा मासूम दिखता है।कांटों भरे गुलाब से भला कैसे दोस्ती कर लूं।।


उम्मीद की दहलीज पर रोज रोता ही रहा हूं।
लांघ के मगर पार कैसे अब ये गली कर लूं।।

लिखे थे मुझे जो खत मोहब्बत में उसने कभी।
चलो आज उनको ही जला कुछ रोशनी कर लूं।।

"उस्ताद" जो हुआ हो कभी खुद का ही नहीं।
भला अपनाने की उसे कैसे मनौती कर लूं।।

नलिन "उस्ताद" 

Thursday, 9 July 2026

६७६: ग़ज़ल (९/७/२६)

रिश्ते आज सारे रसातल में धकेले जा रहे।
पर जान कर भी हम अनजान बने जा रहे।।
भरोसा,एतबार किस पर कितना करें यारब।
दो टके में यहां तो लोग ईमान बेचे जा रहे।।
नया दौर है सो अफसाने भी हैं अब अलहदा।
नई रवायतों के नाम पर बस भटकाए जा रहे।।
हरे-भरे दरख़्त काट जो कुदरत को जख्म दिए।
बगैर बरसे काले बादल अंगूठा दिखाते जा रहे।।
एक नई सुबह सजाने की कवायद यूं हो रही है।
बड़े उस्तादों के किले भी बेखौफ ढ़हाए जा रहे।।

नलिन "उस्ताद"



Friday, 3 July 2026

ग़ज़ल ३/७/२६। ।।६७५।।

बन के बच्चा नहाता रहा जब-जब बरसात में। 
खिलखिलाता रहा दर्द की हर एक सौगात में।।

जिस-जिस का भी नाम आ रहा विश्वासघात में।
पकड़ रंगे हाथ उनको ठूंसिए ताउम्र हवालात में।।

कहीं की ईंट,कहीं का रोड़ा लेकर जुड़े हैं जो कोई। 
दरअसल सौदेबाजी कर रहे रचने को खुराफात में।

ईश्रवर से जोड़िए तो कभी-कभार अपने रिश्ते।
कुदरत के जा देखिए करिश्मे सुबह,शाम,रात में।‌।

खुद्दारी* है तो है इस कंगाल हाल में भी उसकी देखिए।
लेता नहीं कभी कुछ भी,किसी से "उस्ताद" खैरात में।।
नलिन "उस्ताद"