Friday, 3 July 2026

ग़ज़ल ३/७/२६। ।।६७५।।

बन के बच्चा नहाता रहा जब-जब बरसात में। 
खिलखिलाता रहा दर्द की हर एक सौगात में।।

जिस-जिस का भी नाम आ रहा विश्वासघात में।
पकड़ रंगे हाथ उनको ठूंसिए ताउम्र हवालात में।।

कहीं की ईंट,कहीं का रोड़ा लेकर जुड़े हैं जो कोई। 
दरअसल सौदेबाजी कर रहे रचने को खुराफात में।

ईश्रवर से जोड़िए तो कभी-कभार अपने रिश्ते।
कुदरत के जा देखिए करिश्मे सुबह,शाम,रात में।‌।

खुद्दारी* है तो है इस कंगाल हाल में भी उसकी देखिए।
लेता नहीं कभी कुछ भी,किसी से "उस्ताद" खैरात में।।
नलिन "उस्ताद"

Wednesday, 1 July 2026

६७४: ग़ज़ल

हजारों अरमान लिए लो हम आ तो गए दुनिया में।
किसे पता था ये किसी के पूरे नहीं हुए दुनिया में।।

पंख फड़फड़ाए यूं तो हजार बार पिंजरे में हमने।
मर कर ही मगर आजाद हो उड़ पाए दुनिया में।।

जाने किस तरह जीने का सलीका सिखा रहे हैं लोग।
ये अजीब रंग-ढंग हमें भला कहां भाए दुनिया में।।

ठान के आए थे इस बार तुझे अपना बना ही लेंगे। 
हर बार के जैसे पर कांच ही बटोर लिए दुनिया में।

आंखों में चमक थी,हौसला था कुछ कर दिखाने का।
हर दिल अज़ीज़ हो तभी तो "उस्ताद" छाए दुनिया में।।
 ।।नलिन उस्ताद।।


Tuesday, 3 March 2026

६७३: टेसू के फूल

टेसू के फूल शरबती आंखों में खिल रहे।

यार के संग अपने जब हम गले मिल रहे।।

रंगो का त्यौहार जब शबाब पर आया।

सुरूर तो छाया पर ये लब हैं सिल रहे।।

एक दिन जब वो मिलने को कह गए।

रात सारी ख्वाब रंगीन देखते दिल रहे।।

मौसम की तरह बदलते दिखते हैं सब लोग।

कहो कौन अब जो ज़ुबां ए मुस्तकबिल रहे।।

बस फरियाद,आरजू तुझसे एक यही यारब।

बगैर "उस्ताद" जेहन न तेरा मुन्तक़िल रहे।।

नलिन "उस्ताद"

६७२: खुदा के सिवा

खुदा के सिवा और कुछ भी,वो हैं जानते नहीं।

हद है मगर,जहां खुदा उसे कतई मानते नहीं।।


मतलब पड़े तो,दस बार आते हैं तलवे चाटने। 

वरना तो भूल कर कभी,चौखट झांकते नहीं।।


मोहब्बत में हमसे,किए तो थे अनगिनत वायदे।

जाने कहां,किस दुनिया में हैं,जो निभाते नहीं।।


वही बेशर्मी,धोखे लिए आ गए फिर बस्ती में।

खोटे सिक्के मगर बार-बार कभी चलते नहीं।।


होली-दीवाली के मौसम तो आ रहे हर साल।

जोश,जज्बा,रवानगी पहले सी वो भरते नहीं।।


यूं जब भी मिले कलाम पर हमारे सजदा किया।

जो भेजे हजार एक भी "उस्ताद" छापते नहीं।।


नलिन "उस्ताद"

६७१: लो फिर से एक बार दर्द को हवा दी है

लो फिर से एक बार दर्द को हवा दी है।

खुद को ही अपनी कलम से सजा दी है।।

कहें तो कैसे कहें भला उसे हम बेवफ़ा।

जाने कब से ये लौ उसकी जला रखी है।।

पहल हम करें या करें यार अब वो।

हर हाल तक़दीर ए क़ज़ा अपनी है।।

दरिया,मैदान,पहाड़ सब छान लिए।

कौन जाने कहां से ये सदा आती है।।

बांहों में भर लोगे तुम ये यक़ीन तो है मुझे।

जिस्म अब "उस्ताद" सांस कहां आती है।।

नलिन "उस्ताद"

Monday, 15 September 2025

जब भी जलतरंग सी वो हंसती है।

जब भी जलतरंग सी वो हंसती है।

सच में कहूं बहुत अच्छी लगती है।।

नीले गगन में उड़ते उन्मुक्त पंछी सी।

पल भर में वो उड़ना सिखा देती है।।

कौन कहता है ये पत्थर पिघलते नहीं।

नाम लेकर जब भी वो तुम्हें बुलाती है।।

बेशक जिंदगी के रास्ते हैं टेढ़े-मेढे़ बहुत।

कांटों में भी मगर हंसना वही सिखाती है।।

कभी चलो एक कदम बस उसकी तरफ।

पंखुरी सा हरेक रहस्य खोलती जाती है।।

नलिन "तारकेश" १४/९/२५ रविवार (हिन्दी दिवस पर)

Monday, 25 August 2025

670: ग़ज़ल:: परिंदों को पिंजरे में पालने का शौक न हुजूर पालिए।

परिंदों को पिंजरे में पालने का शौक न हुजूर पालिए।
घोंसला लगाएं या बेहतर रहे जो एक दरख़्त लगाइए।।

कड़ी मेहनत से इनको कहां भला कभी गुरेज रहा है।
अपनी बुरी आदतें खुदा के वास्ते इन पर न थोपिए।।

भोर होने का ऐलान करते जो घर-घर जाकर पुरजोर हैं।
मसनदे-लुत्फ छोड़ आप भी गुलाबी आसमां निहारिए।।

रंजोगम दिखता है कहिए भला कब इनके कलरव‌ में।
लाजवाब करतब आप इनके हर दिन मौज से देखिए।।

एक-एक दाना भी चुगते हैं सेहत का लिहाज़ रखकर।
जिंदगी जीने का शऊर "उस्ताद" अब इनसे सीखिए।।

नलिन तारकेश "उस्ताद"