Monday, 3 August 2026

६८३: ग़ज़ल (३/८/२६)

ये एक दिन और फिर पारे की तरह फिसल गया।
ख्वाब तो अश्क बन आंखों से मेरा निकल गया।।

सूद की खातिर दिया था जिसे मैंने प्यार कभी।
उसका हो हिसाब क्या,जब चला असल गया।।

रपटीली राहे ज़िन्दगी में बार-बार फिसलने को था।
खुदा का शुक्र रहा जो हर बार लेकिन संभल गया।

क्या कहें जो बात थी उसकी मासूमियत में जनाब।
देखा जो दिल ने बस एक बार,और वो मचल गया।

जिसका अक्स दिले आईने में संजोए थे "उस्ताद"।
बेरहम वक्त के हाथों वो भी देखो ओझल हो गया।।

नलिन "उस्ताद" 

Friday, 31 July 2026

६८२: ग़ज़ल ३१/७/२०२६

सोचता हूं इन हवाओं के झोंकों में घुल पाऊं मैं।
चुपचाप कभी तेरे आंचल में आकर सो जाऊं मैं।।

होता रहे बस दीदार तेरा ख्वाब या हकीकत में।
कसम से इसके सिवा और कुछ भी ना चाहूं मैं।।

चाहतें थीं जो हजारों,बेहिसाब दुनिया में मेरी।
तू ही बता एक रोज में ही कैसे भुला सकूं मैं।।

पगडंडियां भी ओझल हो गई हैं अब तो यहां। 
अंधेरे बियाबान कैसे बगैर तेरे रोशनी पाऊं मैं।।

जो है बेहिसाब तेरी रहमत नाचीज़ "उस्ताद" पर। 
भला उसे कैसे चंद लफ़्ज़ों में बता सकता हूं मैं।।

नलिन "उस्ताद "


Monday, 27 July 2026

६८१: ग़ज़ल: २७/७/२६

दर्दे दिल की दास्तां कहो कब‌ तक सुनाएं।
चलो किसी और के घाव में मरहम लगाएं।।

जो गम हमबिस्तर हो चुका है अब हमारे। 
कुछ करें कि किसी और को न वो सताए।।

जो बरसात न होए सावन के महीने मेंतो।
आंखों से चलो हम अपनी ही आंसू बहाएं।।

तुम आ सको तो आ जाना अगर दिल करे। 
अब कब तलक हम राह में आंखें बिछाएं।।

थक गए हैं बेरुखी से जिंदगी की अब तो हम।
बेवजह फिर कब तलक और पतवार चलाएं।।

दुनिया का चलन तो सदा बेहयाई का रहा है।
भला फिर उस पर "उस्ताद" क्यों सिर खपाएं।।

नलिन "उस्ताद"

Thursday, 23 July 2026

ग़ज़ल: ६८० (२३/७/२०२६)

अब यार तू आए या न आए चौखट पर मेरी कभी।
बातें क़सम से वो पुरानी अब तो होने से रहीं कभी।।

तुझे भूलने की बात कही डंके की चोट पर सबसे।
याद आ ही जाती है मगर भूले-बिसरे कभी-कभी।

माना उम्र इजाजत देती नहीं बरसात में भीगने की।
तमन्नाएं थिरकने से पांव को रोक पाती नहीं कभी।।

ये शानो-शौकत,माल-असबाब के पीछे भागे आदमी।
बताओ मगर क्या यहां से ले जा पाए कुछ भी कभी।।


माना तू है बड़ा काबिल,ज़हीन नामचीन "उस्ताद"।
ज्यादा गणित लगाने से भी बात बनती नहीं कभी।

नलिन "उस्ताद" 

Saturday, 18 July 2026

६७९: ग़ज़ल (१८/७/२७)

दुआएं दी मैंने जिसे बद्दुआ उसे दूं भला कैसे। दिल तोड़ने की मगर फिर उसे दूं सजा कैसे।।

खेतों से मेंढ़ें तो सब हटाते दिख रहे हैं लोग।
फसल बर्बाद हो रही तो अब कोसना कैसे।।

सही वक्त है और लोहा भी लाल‌‌ गरम दिख रहा। हो भला ज़र्ब* हथौड़े का तो उसपे सोचना कैसे।।
*प्रहार 
दिले सागर प्यार का ज्वार भाटा जो उठ गया तो। 
कहिए पूनम का चांद देखना छोड़ना होगा कैसे।।

मतवालों की बस्ती में लीजिए "उस्ताद" भी आ गया। 
दुनियावी रवायतों को अब कौन संभाल सकेगा कैसे।।
नलिन "उस्ताद" 


६७८: ग़ज़ल (१६/७/२६)

मुझको भूल जाने की जो धमकी देता है अक्सर।
वो मेरी याद में क़सम से डूबा मिलता है अक्सर।।

खोटा सिक्का कह के जिसे नकारते हैं घरवाले।
लाचार उन्हीं सांसों का सहारा बनता है अक्सर।।

थपेड़ों में ज़िन्दगी के जिसके खातिर जद्दोजहद की।
देखा बहुत बार वो अपने करीब ही मिलता है अक्सर।।

काले घने बादल जो मंडरा के गरजते हैं छत पर।
शोख हवा के इशारे से रास्ते बदल देता है अक्सर 


उंगली पकड़ जिसे सिखाया था चलना हर कदम। बन "उस्ताद" हमारा सबसे मिलवाता है अक्सर।।

नलिन "उस्ताद" 

Wednesday, 15 July 2026

६७७: ग़ज़ल (१५/७/२६) उसकी वफ़ा का

उसकी वफ़ा का बता कैसे मैं यकीं कर लूं।  

ये पांव क्यों अपना दलदली जमीं कर लूं।।


चेहरे से तो वो सच में बड़ा मासूम दिखता है।कांटों भरे गुलाब से भला कैसे दोस्ती कर लूं।।


उम्मीद की दहलीज पर रोज रोता ही रहा हूं।
लांघ के मगर पार कैसे अब ये गली कर लूं।।

लिखे थे मुझे जो खत मोहब्बत में उसने कभी।
चलो आज उनको ही जला कुछ रोशनी कर लूं।।

"उस्ताद" जो हुआ हो कभी खुद का ही नहीं।
भला अपनाने की उसे कैसे मनौती कर लूं।।

नलिन "उस्ताद"