Astro Kavi 'Tarkesh'
I am an Astrologer,Amateur Singer,Poet n Writer. Interests are Spirituality, Meditation,Classical Music and Hindi Literature.
Wednesday, 1 July 2026
६७४: ग़ज़ल
Tuesday, 3 March 2026
६७३: टेसू के फूल
टेसू के फूल शरबती आंखों में खिल रहे।
यार के संग अपने जब हम गले मिल रहे।।
रंगो का त्यौहार जब शबाब पर आया।
सुरूर तो छाया पर ये लब हैं सिल रहे।।
एक दिन जब वो मिलने को कह गए।
रात सारी ख्वाब रंगीन देखते दिल रहे।।
मौसम की तरह बदलते दिखते हैं सब लोग।
कहो कौन अब जो ज़ुबां ए मुस्तकबिल रहे।।
बस फरियाद,आरजू तुझसे एक यही यारब।
बगैर "उस्ताद" जेहन न तेरा मुन्तक़िल रहे।।
नलिन "उस्ताद"
६७२: खुदा के सिवा
खुदा के सिवा और कुछ भी,वो हैं जानते नहीं।
हद है मगर,जहां खुदा उसे कतई मानते नहीं।।
मतलब पड़े तो,दस बार आते हैं तलवे चाटने।
वरना तो भूल कर कभी,चौखट झांकते नहीं।।
मोहब्बत में हमसे,किए तो थे अनगिनत वायदे।
जाने कहां,किस दुनिया में हैं,जो निभाते नहीं।।
वही बेशर्मी,धोखे लिए आ गए फिर बस्ती में।
खोटे सिक्के मगर बार-बार कभी चलते नहीं।।
होली-दीवाली के मौसम तो आ रहे हर साल।
जोश,जज्बा,रवानगी पहले सी वो भरते नहीं।।
यूं जब भी मिले कलाम पर हमारे सजदा किया।
जो भेजे हजार एक भी "उस्ताद" छापते नहीं।।
नलिन "उस्ताद"
६७१: लो फिर से एक बार दर्द को हवा दी है
लो फिर से एक बार दर्द को हवा दी है।
खुद को ही अपनी कलम से सजा दी है।।
कहें तो कैसे कहें भला उसे हम बेवफ़ा।
जाने कब से ये लौ उसकी जला रखी है।।
पहल हम करें या करें यार अब वो।
हर हाल तक़दीर ए क़ज़ा अपनी है।।
दरिया,मैदान,पहाड़ सब छान लिए।
कौन जाने कहां से ये सदा आती है।।
बांहों में भर लोगे तुम ये यक़ीन तो है मुझे।
जिस्म अब "उस्ताद" सांस कहां आती है।।
नलिन "उस्ताद"
Monday, 15 September 2025
जब भी जलतरंग सी वो हंसती है।
जब भी जलतरंग सी वो हंसती है।
सच में कहूं बहुत अच्छी लगती है।।
नीले गगन में उड़ते उन्मुक्त पंछी सी।
पल भर में वो उड़ना सिखा देती है।।
कौन कहता है ये पत्थर पिघलते नहीं।
नाम लेकर जब भी वो तुम्हें बुलाती है।।
बेशक जिंदगी के रास्ते हैं टेढ़े-मेढे़ बहुत।
कांटों में भी मगर हंसना वही सिखाती है।।
कभी चलो एक कदम बस उसकी तरफ।
पंखुरी सा हरेक रहस्य खोलती जाती है।।
नलिन "तारकेश" १४/९/२५ रविवार (हिन्दी दिवस पर)