Saturday, 18 July 2026

६७९: ग़ज़ल (१८/७/२७)

दुआएं दी मैंने जिसे बद्दुआ उसे दूं भला कैसे। दिल तोड़ने की मगर फिर उसे दूं सजा कैसे।।

खेतों से मेंढ़ें तो सब हटाते दिख रहे हैं लोग।
फसल बर्बाद हो रही तो अब कोसना कैसे।।

सही वक्त है और लोहा भी लाल‌‌ गरम दिख रहा। हो भला ज़र्ब* हथौड़े का तो उसपे सोचना कैसे।।
*प्रहार 
दिले सागर प्यार का ज्वार भाटा जो उठ गया तो। 
कहिए पूनम का चांद देखना छोड़ना होगा कैसे।।

मतवालों की बस्ती में लीजिए "उस्ताद" भी आ गया। 
दुनियावी रवायतों को अब कौन संभाल सकेगा कैसे।।
नलिन "उस्ताद" 


६७८: ग़ज़ल (१६/७/२६)

मुझको भूल जाने की जो धमकी देता है अक्सर।
वो मेरी याद में क़सम से डूबा मिलता है अक्सर।।

खोटा सिक्का कह के जिसे नकारते हैं घरवाले।
लाचार उन्हीं सांसों का सहारा बनता है अक्सर।।

थपेड़ों में ज़िन्दगी के जिसके खातिर जद्दोजहद की।
देखा बहुत बार वो अपने करीब ही मिलता है अक्सर।।

काले घने बादल जो मंडरा के गरजते हैं छत पर।
शोख हवा के इशारे से रास्ते बदल देता है अक्सर 


उंगली पकड़ जिसे सिखाया था चलना हर कदम। बन "उस्ताद" हमारा सबसे मिलवाता है अक्सर।।

नलिन "उस्ताद" 

Wednesday, 15 July 2026

६७७: ग़ज़ल (१५/७/२६) उसकी वफ़ा का

उसकी वफ़ा का बता कैसे मैं यकीं कर लूं।  

ये पांव क्यों अपना दलदली जमीं कर लूं।।


चेहरे से तो वो सच में बड़ा मासूम दिखता है।कांटों भरे गुलाब से भला कैसे दोस्ती कर लूं।।


उम्मीद की दहलीज पर रोज रोता ही रहा हूं।
लांघ के मगर पार कैसे अब ये गली कर लूं।।

लिखे थे मुझे जो खत मोहब्बत में उसने कभी।
चलो आज उनको ही जला कुछ रोशनी कर लूं।।

"उस्ताद" जो हुआ हो कभी खुद का ही नहीं।
भला अपनाने की उसे कैसे मनौती कर लूं।।

नलिन "उस्ताद" 

Thursday, 9 July 2026

६७६: ग़ज़ल (९/७/२६)

रिश्ते आज सारे रसातल में धकेले जा रहे।
पर जान कर भी हम अनजान बने जा रहे।।
भरोसा,एतबार किस पर कितना करें यारब।
दो टके में यहां तो लोग ईमान बेचे जा रहे।।
नया दौर है सो अफसाने भी हैं अब अलहदा।
नई रवायतों के नाम पर बस भटकाए जा रहे।।
हरे-भरे दरख़्त काट जो कुदरत को जख्म दिए।
बगैर बरसे काले बादल अंगूठा दिखाते जा रहे।।
एक नई सुबह सजाने की कवायद यूं हो रही है।
बड़े उस्तादों के किले भी बेखौफ ढ़हाए जा रहे।।

नलिन "उस्ताद"



Friday, 3 July 2026

ग़ज़ल ३/७/२६। ।।६७५।।

बन के बच्चा नहाता रहा जब-जब बरसात में। 
खिलखिलाता रहा दर्द की हर एक सौगात में।।

जिस-जिस का भी नाम आ रहा विश्वासघात में।
पकड़ रंगे हाथ उनको ठूंसिए ताउम्र हवालात में।।

कहीं की ईंट,कहीं का रोड़ा लेकर जुड़े हैं जो कोई। 
दरअसल सौदेबाजी कर रहे रचने को खुराफात में।

ईश्रवर से जोड़िए तो कभी-कभार अपने रिश्ते।
कुदरत के जा देखिए करिश्मे सुबह,शाम,रात में।‌।

खुद्दारी* है तो है इस कंगाल हाल में भी उसकी देखिए।
लेता नहीं कभी कुछ भी,किसी से "उस्ताद" खैरात में।।
नलिन "उस्ताद"

Wednesday, 1 July 2026

६७४: ग़ज़ल

हजारों अरमान लिए लो हम आ तो गए दुनिया में।
किसे पता था ये किसी के पूरे नहीं हुए दुनिया में।।

पंख फड़फड़ाए यूं तो हजार बार पिंजरे में हमने।
मर कर ही मगर आजाद हो उड़ पाए दुनिया में।।

जाने किस तरह जीने का सलीका सिखा रहे हैं लोग।
ये अजीब रंग-ढंग हमें भला कहां भाए दुनिया में।।

ठान के आए थे इस बार तुझे अपना बना ही लेंगे। 
हर बार के जैसे पर कांच ही बटोर लिए दुनिया में।

आंखों में चमक थी,हौसला था कुछ कर दिखाने का।
हर दिल अज़ीज़ हो तभी तो "उस्ताद" छाए दुनिया में।।
 ।।नलिन उस्ताद।।


Tuesday, 3 March 2026

६७३: टेसू के फूल

टेसू के फूल शरबती आंखों में खिल रहे।

यार के संग अपने जब हम गले मिल रहे।।

रंगो का त्यौहार जब शबाब पर आया।

सुरूर तो छाया पर ये लब हैं सिल रहे।।

एक दिन जब वो मिलने को कह गए।

रात सारी ख्वाब रंगीन देखते दिल रहे।।

मौसम की तरह बदलते दिखते हैं सब लोग।

कहो कौन अब जो ज़ुबां ए मुस्तकबिल रहे।।

बस फरियाद,आरजू तुझसे एक यही यारब।

बगैर "उस्ताद" जेहन न तेरा मुन्तक़िल रहे।।

नलिन "उस्ताद"