ख्वाब तो अश्क बन आंखों से मेरा निकल गया।।
सूद की खातिर दिया था जिसे मैंने प्यार कभी।
उसका हो हिसाब क्या,जब चला असल गया।।
रपटीली राहे ज़िन्दगी में बार-बार फिसलने को था।
खुदा का शुक्र रहा जो हर बार लेकिन संभल गया।
क्या कहें जो बात थी उसकी मासूमियत में जनाब।
देखा जो दिल ने बस एक बार,और वो मचल गया।
जिसका अक्स दिले आईने में संजोए थे "उस्ताद"।
बेरहम वक्त के हाथों वो भी देखो ओझल हो गया।।
नलिन "उस्ताद"