लो फिर से एक बार दर्द को हवा दी है।
खुद को ही अपनी कलम से सजा दी है।।
कहें तो कैसे कहें भला उसे हम बेवफ़ा।
जाने कब से ये लौ उसकी जला रखी है।।
पहल हम करें या करें यार अब वो।
हर हाल तक़दीर ए क़ज़ा अपनी है।।
दरिया,मैदान,पहाड़ सब छान लिए।
कौन जाने कहां से ये सदा आती है।।
बांहों में भर लोगे तुम ये यक़ीन तो है मुझे।
जिस्म अब "उस्ताद" सांस कहां आती है।।
नलिन "उस्ताद"
काॅफी समय बाद कलम से निकले शब्द रंगोत्सव की धूम में अलग रंग जमा रहे हैं।👌✨💫
ReplyDeleteAapne Atyant Sundar Tareeke se Rachna Kalam se Utaar Di. Very nice👍
ReplyDeleteHappy Holi. Rang Barse
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteHappy holi
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