खुदा के सिवा और कुछ भी,वो हैं जानते नहीं।
हद है मगर,जहां खुदा उसे कतई मानते नहीं।।
मतलब पड़े तो,दस बार आते हैं तलवे चाटने।
वरना तो भूल कर कभी,चौखट झांकते नहीं।।
मोहब्बत में हमसे,किए तो थे अनगिनत वायदे।
जाने कहां,किस दुनिया में हैं,जो निभाते नहीं।।
वही बेशर्मी,धोखे लिए आ गए फिर बस्ती में।
खोटे सिक्के मगर बार-बार कभी चलते नहीं।।
होली-दीवाली के मौसम तो आ रहे हर साल।
जोश,जज्बा,रवानगी पहले सी वो भरते नहीं।।
यूं जब भी मिले कलाम पर हमारे सजदा किया।
जो भेजे हजार एक भी "उस्ताद" छापते नहीं।।
नलिन "उस्ताद"
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