Thursday, 13 August 2026

६८४: ग़ज़ल: १३/८/२०२६

अंधकार हुआ जबसे नसीब अपना क्या करें।
कमबख्त दिल है जब ग़म से बुझा क्या करें।।

चले तो हम हर एक डगर उसे तलाशने को।
मंजिल को ही नहीं गया जो रास्ता क्या करें।।

चातक,पपीहा,मोर बेबस ताकते हैं आसमां।
जो सावन-भादो ही न बरसें बदरा क्या करें।।

हर तरफ़ शोर ही शोर है काग़ज़ी इंकलाब का।
असल ज़मीं कोई खड़ा नहीं दिखता क्या करें।।

तबीयत नासाज है कुछ आजकल "उस्ताद" की। 
उठा रहे हैं उसका लोग फायदा बता क्या करें।।

नलिन "उस्ताद" 

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