Thursday, 3 September 2026

६८६: ग़ज़ल (२४/८/२६)

जाने क्यों आईने से ही नज़रें चुराता है आदमी।
झूठ तो एक रोज बेनकाब कर देता है आदमी।।

हवा में कुलांचे भरने का हुनर तो बहुत अच्छा है।
जिद में मगर संपाती सा पंख जलाता है आदमी।।

मां-बाप,दोस्त सब आख़िर दर्द बांटने को ही हैं।
छुपन-छुपाई मगर उनसे भी खेलता है आदमी।।

गलतियां तो जाने-अनजाने हो जाती हैं सभी से।
सबक उनसे न सीखे तो अक्सर रोता है आदमी।।

जख्म कुरेदे कोई तो दर्द होना लाजमी है "उस्ताद"।
दाई से ही मगर पेट क्यों छुपाना चाहता है आदमी।

नलिन "उस्ताद"

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