झूठ तो एक रोज बेनकाब कर देता है आदमी।।
हवा में कुलांचे भरने का हुनर तो बहुत अच्छा है।
जिद में मगर संपाती सा पंख जलाता है आदमी।।
मां-बाप,दोस्त सब आख़िर दर्द बांटने को ही हैं।
छुपन-छुपाई मगर उनसे भी खेलता है आदमी।।
गलतियां तो जाने-अनजाने हो जाती हैं सभी से।
सबक उनसे न सीखे तो अक्सर रोता है आदमी।।
जख्म कुरेदे कोई तो दर्द होना लाजमी है "उस्ताद"।
दाई से ही मगर पेट क्यों छुपाना चाहता है आदमी।
नलिन "उस्ताद"
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