Monday, 30 December 2019

नववर्ष की पदचाप

नववर्ष की पदचाप,अब सबको,स्पष्ट सुनाई दे रही। 
बस दो कदम,दहलीज पर शान से,नूपुर बजा रही।।
सो मन-मयूर,अह्लादित हुआ,बड़ा आज सबका अभी से।
आस भरी सुनहरी उम्मीदें,कलरव सी,अंगड़ाईयां ले रही।।
उत्साह,उल्लास,उमंग से सजावट होती प्रत्येक द्वार-द्वार।
चटक इंद्रधनुषी रंगोली,हर जगह रोशनी सी है,चमक रही।
नव-संकल्प,नव-ऊर्जा की नव-तरंग हवा में मकरन्द सी।
कल्पना की ऊंची उड़ान का सन्देश हर-सांस में भर रही।। 
है करना अलबेला,सार्थक कुछ अब तो हमें नया निस्वार्थ। 
जय-घोष स्वस्तिवाचन से ओतप्रोत प्रज्ञा ये सीख दे रही।।
@नलिन #तारकेश

Sunday, 29 December 2019

296:गज़ल:खुले आकाश में

खुले आकाश में इन परिंदों को उड़ने दो।
दम न तुम मगर यूं ख्वाबों का घुटने दो।।
मासूम कलियों को न तोड़ो ए बागवां।
सुर्ख़ फूल बन उन्हें भी तो महकने दो।।
वह साजिशों से संभल गया फिसल कर भी।
तोहमत कम से कम अब तो मढना रहने दो।।
मिलकर लिखनी है हमें इबारत बुलंदियों की अभी।
बहा के खून गलियों में यूँ हौसलों को न मरने दो।।
जहालत,नफरत भरी सियासत की इन्तेहा हो गई।
"उस्ताद"अमनो चैन की रोशनी मुल्क में होने दो।।
@नलिन#उस्ताद

Saturday, 28 December 2019

295-गजल-दाँत मेरे

दांत  मेरे जुबान मेरी ही काटने लगे।
खा के थाली में छेद लोग करने लगे।।
आंख कान मुंह बंद है गांधी के बंदरों के।
कहो कब कहाँ ये नामुराद सच बोलने लगे।।
गंगा जमुनी तहजीब कागजी बातें रह गई।
चलो शेखचिल्लियों के सपने तो टूटने लगे।।
अमन-चैन का ठेका कब तलक ढोयेंगे हम।
लातों के भूत कब तलक बातों से मानने लगे।।
भेड़ियों की बंद हुई जो हुकूमत मैं बंदरबांट। 
गरीब,नासमझों को निवाला ये बनाने लगे।।
फैसला होना चाहिए"उस्ताद"अब तो आर पार का।
बढ़े कदम जो सही राह कहां अब पीछे हटने लगे।।
@नलिन#उस्ताद

294:गजल-नमाज़ जुम्मे की

नमाज जुम्मे की अब हमारे जी का जंजाल हो रही।
आवाज जो थी अमन-चैन की वही बवाल हो रही।। 
जब चाहा तब मतलब-बेमतलब हाथ मोमबत्ती उठा ली। बता इसे सच की मशाल आगजनी खूब कमाल हो रही।। सियासत में अपने फायदे के सौदे तो सभी बांचते हैं।
जनता मुल्क की पर अब रोज़ बेवजह हलाल हो रही।।
ये कैसे नए जमाने के आलिम*,कुकुरमुत्तों से बढ़ रहे।*बुद्धिजीवी 
बयानबाजी ही जिनकी सितमगरों की ढाल हो रही।।
घुसपैठिए जो लूटने को आमदा हैं उन्हें सिर आंखों बैठा रहे।
वकालत उनकी यही तेरी आंख में सूअर का बाल हो रही।। 
ये उल्टी-सीधी कैसी पढ़ाते हो पट्टी तकरीर से अपनी। 
प्यार-मोहब्बत की बातें तो सब महज ख्याल हो रही।।
नेट में फंसा रहे मजलूम,मासूम मछलियां शिकार को।
डिजिटल इंडिया की तबीयत खामखां बेहाल हो रही।।तुम तो जो करो या कहो वो सब सवाब* से है लबालब  भरा।*पुण्य 
"उस्ताद"हमारी ही कथनी,करनी कहो क्यों सवाल हो रही।।
@नलिन #उस्ताद

Thursday, 26 December 2019

राम राम राम

श्री राम
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रविकुल नायक,दीप्तमान-मुखकांति,अमित सजी है।
पीत-झगुली,रेशम तन झीनी,कुंतलराशि घुंघराली है।।
रक्तवर्ण-तिलक,भाल-सुशोभित,अद्भुत छवि न्यारी है। कोटि-कोटि मनोज लजावत, रूपराशि प्रभु प्यारी है।। बांकी लीला देख के इनकी,माया भी सुध-बुध भूली है। शेष,शारदा पार न पाए,कीरती ऐसी अविरल बहती है।।
हृदय-विराजत,तारकेश-छवि पर,चरणाश्रित बलिहारी है।
निर्मल,नील-नयन सी मृदुल देह,आँखन सबके बसती है।। 
जाने कितनी जनम-जनम की,साध ये पूरी आज हुयी है।
अब ना जाना कहीं छोड़ के,तुमसे बस अरदास यही है।।
@नलिन #तारकेश

Wednesday, 25 December 2019

293-गज़ल उम्र होती है

नौजवानी Happy Christmas to all 
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उम्र होती है यार एक इतराने की।
खुली पलकों में ख्वाब सजाने की।।
टोका-टाकी लाख करे चाहे कोई।
गढ़ती है रोज इमारत फसाने की।।
नशातारी रहती है जिस्म से रूह तक ऐसी।
कहाँ होश है इसे,कदम संभाल चलाने की।।
सूरज,चांद,दरिया सब बांधके मुट्ठी में।
किसे फिक्र रहती भला जीने-मरने की।।
हवा के घोड़े हाँकती,तलाशे-कस्तूरी मसरूफ दिखे। 
"उस्ताद" अजब है कहानी इस नौजवानी की।।
@नलिन#उस्ताद

Thursday, 19 December 2019

292-गज़ल:जो जो तुमने कहा

जो-जो तुमने कहा था वही हम कर रहे।
जाने बदनाम क्यों अब तुमही कर रहे।।
कलम होनी थी जिस हाथ में इल्म* के लिए।*हुनर         उसी में संग* ले तुम जंग की तैयारी कर रहे।।*पत्थर 
बहस-मुबाहिसा होती हैं रगबत* भरी तहकीक**से।
*प्यार  **जाँच-पड़ताल 
नासमझ तुम तो गालियों की बस जुगाली कर रहे।।
है आसां नहीं पनघट की राहें सभी जानते।
मगर तुम तो राजनीति हिंसा भरी कर रहे।।
आशियाना जलेगा तो महफ़ूज* कौन होगा कहो तो।*सुरक्षित 
ऐसी बात जाने क्यों चिंगारी भड़काने की कर रहे।। 
खौफ,आगजनी की बिसातें भड़का के सरेआम।
"उस्ताद" खरी बात तुम मुल्क से गद्दारी कर रहे।।
@नलिन#उस्ताद