Tuesday, 9 July 2024

ग़ज़ल:६४६: कसम खुदा,असर प्यार की बरसात का होता है

कसम खुदा,असर प्यार की बरसात का होता है। 
साथ उसके,सूखे दरख़्त का भी रंग हरा होता है।। 

ज़ख्म देकर मरहम लगाने से,भला है‌ क्या फायदा।
जनाबे आली,दर्द इससे तो और भी गहरा होता है।। 

जब भी उसकी चौखट पर जा,हमने सजदा किया।
न जाने कहां ये दर्द उड़नछू,सारे का सारा होता है।।

दिल का जो अजीज हुआ,तो फिर कहां वो गैर रहा।
प्यार का रंग तो यही है,जब-जब गहरा चढ़ा होता है।।

"उस्ताद" हमने तजुर्बे से अपने यही देखा और पाया है।
आदमी कोई हो,गरीब या अमीर,बस दिल से होता है।।

नलिन "उस्ताद" 

Sunday, 7 July 2024

६४५: ग़ज़ल: काहे को तुम इतना सोचते खामखां

काहे को तुम इतना सोचते खामखां।
दो दिन की इस जिंदगी में खामखां।।

अब तक देखा तो है तुमने हर बार ही।
ख्वाब बुने मगर सच कितने खामखां।।

मेहनत मशक्कत करना ठीक है चलो।
खुद को क्यों हो रहते गलाते ख़ामखां।।

हंस के बोलो,बतियाओ और गाओ जरा।
सन्नाटे में बैठ भला क्या करोगे ख़ामखां।।
उस्ताद
कुदरत में हैं नज़ारे गजब के बिखरे हुए।
भरे हो तुम क्यों "उस्ताद" आंखें ख़ामखां।।

नलिन "उस्ताद" 

Saturday, 6 July 2024

६४४: ग़ज़ल: सोचता हूं बादलों की तरह उड़ना सीख जाऊं

सोचता हूं बादलों की तरह उड़ना सीख जाऊं। 
मगर है तभी संभव जब थोड़ा हल्का हो पाऊं।।

जमीन रहे कदमों में मेरे और बाहों में आकाश हो। 
मुश्किल कुछ नहीं जो शिद्दत से खुद को संवारूं।।

जो रूठने को ही प्यार का इजहार है समझता।
रूठे दिलदार को ऐसे बता भला कैसे मनाऊं।।

मोहब्बत तो असल वो है जिसमें दो जान एक हैं।
फिर रहें पास या दूर ये बात कैसे उसे समझाऊं।।

उमड़-घुमड़ रहे बादल बरखा भी तेज हो रही खूब।
सोचता हूं एक चक्कर बगैर छतरी भीगकर आऊं।।

चाहता तो हूं अपनी तस्वीर को आईने में निहारना।
बात तब है "उस्ताद" किरदार जो खुद का निखारूं।।

नलिन "उस्ताद"

Friday, 5 July 2024

६४३: ग़ज़ल: वो खट्टी-मीठी यादें बचपन की बरसात में

वो खट्टी-मीठी यादें,बचपन की बरसात में।
याद आने लग रहीं,पचपन* की बरसात में।।
*यूं उम्र अभी बहुत छोटी है 

खूब तैरायीं थीं जो,कागज की कश्तियां हमने।
लगती हैं वो बातें अब,अड़चन की बरसात में।।

अरदास करी बादल से जो स्कूल न जाने की।
मगर रहीं वो सभी अधूरी,मन की बरसात में।।

टूटे हैं ख्वाब नशीले,अरमानों के कितने ही‌ अपने।
उस दौर से भी हम हैं गुज़रे,जीवन की बरसात में।।

दिल नाचता है मोर जैसा आज भी,"उस्ताद" का।
देखता है वो जैसे ही घटाएं‌,सावन की बरसात में।।

 नलिन "उस्ताद"


Thursday, 4 July 2024

642: ग़ज़ल: बरसात में न भीगे ‌तो

बरसात में न भीगे तो भीगेंगे जनाब कब भला आप।
बीती बातों का लगाते ही क्यों हैं हिसाब सदा आप।।

हर उम्र का,हर घड़ी का होता है अलग अंदाज़े बयां।
घुल-मिल जाया कीजिए माहौल में,मिले जैसा आप।।

हसीन ख्वाब दिखाए थे हथेली में सरसों के उगाने जैसे। 
दिखाने के काबिल कहां रहे अब अपना ही चेहरा आप।।

सुकून भी है जरूरी उठा-पटक की जिंदगी के साथ में। 
नंगे पांव चल के देखिए सुबह दूब में कभी जरा आप।।

ये जिंदगी "उस्ताद" हमें रास आई नहीं कभी भी सच में।
मगर चलो गुजार के देख लिया जाए संग इकठ्ठा आप।।

नलिन "उस्ताद"

Tuesday, 2 July 2024

६४१: ग़ज़ल: निभाना आसान है बड़ा जानिए यूं दुनियादारी को

निभाना आसान है बड़ा जानिए यूं दुनियादारी को।
कांटों पर तो है चलना हर कदम लेकर खुद्दारी को।।

उनकी चौखट तक हम आ तो गए कलेजा थामे हुए।
सदा दें मगर उन्हें कहिए कैसे सर-ए-आम दोपहरी को।।

जिंदगी की राहें ना पहले कभी आसान थी ना अब हैं।
हर हाल जीकर मगर देखना तो होगा इस जिंदगी को।।

सीधे-साधे रास्ते पर चलते रहिए आप चुपचाप बस। 
ज्यादा हवा मत कभी दीजिए अपनी तलाबेली* को।।
*लालसा

एक फुहार में कितनी उम्मीद लिए गुल फिर खिल गए।
"उस्ताद" खुद पर भी तो आजमाएं जरा इस कसौटी को।।

नलिन "उस्ताद"

Monday, 1 July 2024

६४०: ग़ज़ल: वो रकीब ही हो चाहे पर लगता है प्यारा

वो रकीब ही हो चाहे पर लगता है प्यारा।
शिद्दत से कम से कम लेता तो है बदला।।

भले,बुरे से किसी को फर्क पड़ता अब कहां। 
हर कोई बस अपने मतलब से वास्ता रखता।।

अलग ही एक रवायत शुरू हो गई है यारब।
करे इश्क का दावा मगर साथ नहीं निभाता।।

उमस है बड़ी रिश्तों में दिखाई दे रही आजकल।
बरसने में जाने क्यों प्यार का बादल झिझकता।।

मेरा स्टेटस तो देखता है जरूर हर रोज वो।
मगर कहां "उस्ताद" कभी बातचीत करता।। 

नलिन"उस्ताद"