Saturday, 13 May 2023

524:ग़ज़ल:- गुरूर नहीं टिकता

रास्तों की पहचान भला कौन सिखा सकता। 
हां जुनून हो तो हर कदम मंजिल को चूमता।।

होश में रहते हुए भी नशा तारी जरूरी है।
बगैर इसके हिस्से का जन्नत नहीं मिलता।।

तुम आओ तो सही कभी उसकी अंजुमन में।
यहाँ प्यासा खुदा कसम कोई भी नहीं रहता।।

रेशमी हवा पायल बजाते इशारे से बुला रही। 
भला देखने में ख्वाब किसी का क्या लगता।।

सितारों के लिबास ओढ़े तुम इतरा तो रहे हो।
"उस्ताद" यहाँ किसी का गुरूर नहीं टिकता।।

नलिनतारकेश @उस्ताद 

523: ग़ज़ल:- खुद को जुगनू करें

चलो एक नया चलन अब शुरू करें।
उतर के दिल में उसके गुफ्तगू करें।।

वो कहीं भी हो बस याद आए हमारी।
ऐसा हिचकियों का उसपर जादू करें।।

बेवजह बेवफा ही जब वो हो गया प्यार में। 
हमें भी क्या पड़ी है मोतियों को आंसू करें।।

हर लफ्ज़ जो भी निकले वो तौलकर हमसे।
जुबां को हम अपनी हक़ीक़ी* तराजू करें।।*असल 

अंधेरों में जब साथ छोड़कर जाएं सभी।
आओ "उस्ताद" हम खुद को जुगनू करें।।

नलिनतारकेश @उस्ताद। 

Friday, 12 May 2023

522: ग़ज़ल:गीताप्रेस शताब्दि वर्ष

रास्ते हजार भटक कर भी तेरे दर तक पहुंचना चाहता है।
आदमी वही लाखों में एक अपनी तकदीर लिख पाता है।।

जंगल,नदी,पहाड़ जाने कहाँ-कहाँ से बमुश्किल जैसे-तैसे।
पानी हर हाल समन्दर में मिल वजूद अपना मिटा देता है।।

वो बावला नहीं दरअसल बन्दा बहुत सयाना निकला।
खबर उसे पूरी है ज़िन्दगी को अपनी कैसे संवारना है।।

सबकी नेकी की खातिर जीवन उसने अपना खपा दिया।
सो जितना भी बन पड़े हमसे साथ उसका तो निभाना है।।

"उस्ताद" ये ज़िन्दगी का दौर नरम-गरम ऐसे ही चलेगा।
हमें तो बस बिना किसी तानों,शिकायतों के इसे गुजारना है।

नलिनतारकेश@उस्ताद। 


Wednesday, 10 May 2023

521:ग़ज़ल:- बहुत कहे फ़साने हमने तेरे लिए

हर किताब मुर्दा हर इल्म गूंगा हो गया।
दिल में उतर कर गहरे जो ठहर न सका।।

बहुत कहे फ़साने हमने तेरे लिए यारब।
तूने मगर हर किसी को अनसुना किया।।

बहार आए तो सूखे दरख्त भी हैं खिल जाते।
इसी एक उम्मीद ने हर हाल हमें जिंदा रखा।। 

कयामत की रात का इंतजार भला क्यों करे। 
तेरे सजदे में हर चौखट जो झुक चलता रहा।।

"उस्ताद" तुम भी कसम से खालिस बेअक्ल निकले।
अपनी नादानी का डंका ऐसे है कौन बजाता भला।।

नलिनतारकेश @उस्ताद

Tuesday, 9 May 2023

520: ग़ज़ल:- उस्ताद से कुछ जलवा सुना है

आँखों में जो काजल उसकी लगा है।
उसी ने रात का सारा आंचल बुना है।।

दिन मदहोश और हैं रातें गुलाबी उसी की। 
करीब जिसे उसके रहने का मौका मिला है।।

एक अजब नजाकत लिए हवाएँ खुशबू बिखेरें।
जिस भी डगर को आने का तेरे अंदेशा हुआ है।।

रोंआं-रोंआं रूह का बस फफक कर बरसे।
हुस्ने जमाल का तेरा जो भी जिक्र करता है।। 

सच कहें कसम से अपना तो कुछ भी तजुर्बा नहीं। 
हाँ उसका बस "उस्ताद" से कुछ जलवा सुना है।।

नलिनतारकेश @उस्ताद। 

Monday, 8 May 2023

519: ग़ज़ल:कितने और सावन हैं देखने।।

नींद आती ही नहीं रात सोएं भला कैसे।
हम भूल जाएं कभी मुमकिन नहीं तुझे।।

अन्धड़ चले जब यादों का दिलो-दिमाग में।
जाने कितने अनगिनत ख्वाब बिखर जाते।।

बहुत दूर आ गए हैं हम अहसास-ए-मसरर्त* से। 
*सुखद अनुभूति 
अब मगर आ ही गए हैं तो क्या कुछ कर सकते।।

हर हवा का झौंका नया होकर भी बासी सा लगता।
अजब गफलत में हैं अब करें तो किसे बदनाम करें।।

"उस्ताद" छोड़िए किस उधेड़बुन में खामख्वाह हैं।
अभी न जाने आपने कितने और सावन हैं देखने।।

नलिनतारकेश @उस्ताद 



518:ग़ज़ल: भला कहिए यहाँ कौन किसको चाहता है

भला कहिए,यहाँ कौन किसको चाहता है। 
हर कोई तो बस,अपना मतलब साधता है।।
 
ये खासमखास है,वो है काफिर मेरे लिए।
इसी भरम में अक्सर,आदमी भटकता है।।

दिल-ए-अजीज से भी मिलो,तो एक फासले से।  
क्या ठिकाना आजकल,कब कौन रंग बदलता है।।

उम्मीद पालनी हो अगर,तो बस परवरदिगार से।
यूँ वो तो बिना मांगे तेरी,हर मुराद पूरी करता है।।

वैसे कहो तुम्हें पता ही क्या,भले-बुरे का तुम्हारे लिए।
ये सलीका-ए-फन तो "उस्ताद",बस खुदा जानता है।।

नलिनतारकेश @उस्ताद