Monday, 8 March 2021

328- गजल :महिला दिवस पर

महिला-दिवस 8मार्च पर:
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रिश्तो के गुलों को गूँथने का शऊर* है उसके पास।*सलीका
जाहिल को आलिम बनाने का हुनर है उसके पास।। खैरख्वाह है सबकी फिर अजीज या कि वो गैर हो।
परवरिश की बड़ी अलहदा धरोहर है उसके पास।।
आंचल में संजोई छांव सुकून भरी बस बांटने को।
फकत खुद की चुनी रेतीली दोपहर है उसके पास।।
हर घड़ी,हर सांस बस फिक्रमंद है सबके लिए। 
ये जाने खुदा ही कैसा कलेवर* है उसके पास।।*देह
कहे बगैर कुछ भी तकलीफ जानती है तेरी,मेरी,सबकी।
कहा सच ही "उस्ताद" कयामत की नजर है उसके पास।।

नलिन "उस्ताद "

Saturday, 6 March 2021

327 - गजल:हकीकत ख्वाब तो

हकीकत ख्वाब तो ख्वाब तब्दील हकीकत में हो गए।
उनके साथ चले जब-जब दो कदम हैरत में हो गए।।
आँखों में सुकून देता नहीं अब तो और कोई मंजर।
जब से कैद उम्र भर को उनकी मोहब्बत में हो गए।।
बदलती है तकदीर बस एक पल में देखो कैसे।
अब दुश्मन भी सारे हमारी खिदमत में हो गए।।
दुनिया के छूटे झमेले ये चकरघिन्नी के जैसे।
हम रंगे जबसे उनके रंग में फुर्सत में हो गए।।
भूला दुनियावी तसव्वुर* और खुद को भी भूले। *कल्पना
खुदा की जब से "उस्ताद" इबादत में हो गए।।

नलिन "उस्ताद "

Friday, 5 March 2021

326-गजल :ये तेरी रहमतों

ये तेरी रहमतों* का ही असर है।*कृपा
सुकूं ए जिंदगी न कोई कसर है।।
धन-दौलत,माल-असबाब बेकार सारे। 
चाहिए मुझे तो बस एक तेरी नजर है।।
उठापटक,जद्दोजहद भरी दुनिया में।
बता बिन तेरे कहाँ किसकी बसर है।। 
जो बैठ गया आस्ताने* पर आकर तेरे।*चौखट 
रात कहाँ रात उसकी तो वो सहर* है।।*सुबह 
खुदा की दुनिया में जरा गौर फरमाओ।
हर गम और खुशी सिलसिला ए बहर* है।।*छन्दबद्धता
मुतमइन* हूँ तेरा दीदार तो होकर रहेगा।*इत्मीनान 
यूँ ही तो नहीं "उस्ताद" ए जिगर है।।

नलिन "उस्ताद

Thursday, 4 March 2021

गजल - 325 जरूरत ही बना लो तो

जरूरत ही बना लो तो हर चीज को रो लो।
नहीं तो बन के फकीर तुम कहीं भी सो लो।।
हवस है आदमी की जो बुझती ही नहीं कभी। 
अरे नामुरादों दिमाग की खिड़कियाँ तो खोलो।।
करेगा यूँ तो खुदा ही इलाज दुश्मनों का सारे।
जरा लबों से तुम भी तो मगर इंकलाब बोलो।। 
सुरों का सैलाब रहता है तुम्हारे ही भीतर।
लगाकर सुनो कान और मस्ती में डोलो।।
हो जाएं कलम के तुम्हारी सभी  मुरीद।
गजल में "उस्ताद" कुछ नायाब रंग घोलो।।

नलिन "उस्ताद "

Wednesday, 3 March 2021

गजल - 324 कर्म का थप्पड

ये जो मासूम बनके तू छुरा घोंपता है।
अरे नासमझ अल्लाह सब देखता है।।

जूतियाॅ उठाने में उम्र कट गई सारी।
किस मुँह खुद्दारी की बात कहता है।। 

पोतेगा कालिख तेरा शहर ही तुझ पर एक दिन।
बरगलाता काहे आवाम को हर वक्त रहता है।।

एक मुद्दत से यहाँ गरीब एड़ियां रगड़ रहा।
फरियाद सुनना काहे तौहीन समझता है।।

सर से पानी उतरने ही वाला है गुस्ताखियों का।
नादान सब्र का काहे भला इम्तहान रखता है।।

सहारा उसे क्या चाहिए यहाँ किसी का कहो। 
कहे बगैर जब खुदा उसका हर काम करता है।।

खैंची लकीरों से अपनी ही गुजरता है "उस्ताद" हर कोई।
 भला ये वक्त भी कब,कहाँ किसका गुलाम बनता है।।

नलिन "उस्ताद "

Tuesday, 2 March 2021

गजल- 323 रोना पड़ेगा

रोना पड़ेगा जार-जार ख्वाबों को सजाने के लिए।
खिलेंगे गुल तभी तो बंजर आशियाने के लिए।। 

पता नहीं है अभी तुम्हें पाला पड़ा है किससे।
करेंगे हम हर हद पार तुम्हें मनाने के लिए।। 

गमों का खजाना है जिनके पास अकूत है।
हैं सजाए वो ही लबे हंसी दिखाने के लिए।।

गुनगुनाता है आफताब* चाँदनी मस्ती में झूमती है। 
जबसे आया है मेरा यार मुझे महकाने के लिए।।
(*सूर्य )

मरने को कहोगे तो मर जायेंगे पूरी तरह से भी।
यूँ मर रहे हैं खुद को महज जिलाने के लिए।।

हर हर्फ* पर मेरे करेंगे दानिशमंद** नुक्ताचीनी**
लिखी है ग़ज़ल बस तुझे ही सुनाने के लिए।।
(* शब्द , ** श्रेष्ठ विद्वान, *** कमियाॅ निकालना)

यूँ नहीं बने "उस्ताद" फकत एक दिन में हम।
बेले हैं पापड़ कैसे-कैसे जमाने के लिए।।

नलिन "उस्ताद "

Monday, 1 March 2021

गजल- 322 सजदा उसकी चौखट

सजदा उसकी चौखट पर हर रोज करता हूँ।
तब्दील गमों को यूँ ही खुशियों में करता हूँ।।
आईने की तरह खोलता हूँ यूँ तो कलई सबकी।
हाँ खुद को भी नहीं मगर यार बख्शता हूँ।।
जो किया आज या जन्मों पहले मैंने ही कभी।
आ रहा वहीं झोली तो नसीब क्यों रूठता हूँ।।
कहता है खुदा मिलेगी हर शै जो भी चाहोगे तुम।
फिर भला क्यों नहीं उसे ही शिद्दत से चाहता हूँ।।
  जलजला सा मौजों का सुलगता है रूहे समंदर मेरी। 
  निकाल खजाना तभी तो साहिल* "उस्ताद" फेंकता हूँ ।।

*किनारा
नलिन "उस्ताद "