Wednesday, 6 November 2019

गजल-269:पीनी शराब

छोड़ दी मैंने शराब पीनी कसम से।
पी के निकलता झूठ नहीं कसम से।।
सच का सरेआम कत्ल हुआ है जब से।
बगैर झूठ जिंदगी न गुजरती कसम से।।
देर-सवेर जीतता था सच एक दौर पहले।
हर कदम अब झूठ की बिकवाली*कसम से।।
*मुनाफे हेतु शेयर या हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया
झूठ पढ़ लो चाहे साफ-साफ आंखों में उसकी।
कहने की हकीकत ये ताब* न रही कसम से।।*हिम्मत 
झूठ भी बेच ले होशियारी से जो पूरा सफ़ेद।
है "उस्ताद" वही नामी गिरामी कसम से।।
@नलिन#उस्ताद

Tuesday, 5 November 2019

268:गज़ल:आईना अपना तोड़ के आना

आईना अपना तोड़ के आना।
जब भी मिलने मुझसे आना।। 
झूठ न बोलें मेरी निगाहें।
सोच समझ के तू ये आना।।
अमन चैन से दुनिया को रंगने।
ख्याल तास्सुबी* छोड़ के आना।।*कट्टरता 
नामुमकिन सा कोई हर्फ* नहीं है।*शब्द 
सो बिछड़े ख्वाब संजोने आना।।
कदम-कदम में जोश भरा हो।
दिल को ये तू समझाते आना।।
"उस्ताद"वही है इस दुनिया का।
उसको करके बस सजदे आना।।
@नलिन#उस्ताद

267:गजल

गुनगुनाते मस्ती में तुम बढ़ते रहो। 
जिंदगी की नाव बस यूं ही खेते रहो।।
धुंध है छाई आजकल आसमान में।
हटाने की इसको जुगत लड़ाते रहो।।
एहसास गुनाहों का याद करना ही होगा। 
खुद से नजरें चुराकर अब न बचते रहो।।
नस्लें आने वाली करेंगी कभी न माफ हमको।
सो सबक कुछ भले भी खुद को सिखाते रहो।। 
परिंदे,दरख्त,चौपाए सभी हैं खौफजदा हमसे।
हो आदम तो अपनी इंसानियत बचाते रहो।।
क्या हाल-बेहाल कर दिया है कायनात का तुमने। 
"उस्ताद" सोचो वरना तो हाथ  फिर मलते रहो।।
@नलिन#उस्ताद 

Monday, 4 November 2019

गज़ल 266:अपना ही जब न हो सका आदमी

अपना ही ये जब न हो सका आदमी।
गैर का भला क्या खाक होगा आदमी।।
सितारों में दुनिया बसाने का ख्वाब है पाले हुए।
जमीं में ही ठीक से आता नहीं चलना आदमी।।
हवा,पानी,मिट्टी लो ये जहरीले सभी हो गए। 
हद है मगर नहीं अब तलक जागा आदमी।।
यूँ जो ठान कर हौंसले से जब-जब ये चल पड़ा।
नामुमकिन को भी है मुमकिन बनाता आदमी।
भीड़ ही भीड़ है चारों तरफ यूँ तो आजकल।
लीक से हटके भी दिखाता है चलना आदमी।।
शौक तो बड़ा है "उस्ताद" कहलवाने का।
काश पहले थोड़ा ये बन तो जाता आदमी।।
@नलिन#उस्ताद

दो पुस्तकें संगीत पर

इधर मुझे शास्त्रीय संगीत पर आधारित दो पुस्तकें  पढ़ने का मौका मिला।इसमें एक तो ध्रुपद के प्रख्यात गायक गुंडेचा बंधु के द्वारा शीर्षस्थ संगीतज्ञों  से संवाद पर आधारित है।इस पुस्तक का नाम है "सुनता है गुरु ज्ञानी" इसमें कुल 11 उस्तादों से संवाद है जिनमें उनके गुरु जिया फरीदुद्दीन डागर के साथ ही अन्य चर्चित उस्ताद शामिल हैं।इनमें पंडित भीमसेन जोशी,पंडित जसराज, पंडित हरिप्रसाद,किशोरी अमवकर,अमजद अली खान साहब जैसी संगीत की  दिग्गज  हस्तियां शामिल हैं।क्योंकि यह संवाद स्वयं एक प्रबुद्ध ख्याति प्राप्त गुंडेचा बंधुओं के द्वारा हुआ है तो स्वाभाविक  ही इसमें संगीत की बारीकियों पर गहन विचार-विमर्श और संवाद हुआ है। इस तरह की यह मेरी समझ में पहली और विलक्षण कृति है जिसका संगीत के रसिक लोग अवश्य आनंद उठाना चाहेंगे।दूसरी पुस्तक भी शास्त्रीय संगीत पर आधारित तो है पर इसका आधार फिल्म के गीत-संगीत से जुड़ा है। इसमें उन ढेर सारे गानों की  जानकारी है जो बताती है कि वह संगीत के किन आधारभूत रागों पर पल्लवित पुष्पित हुए हैं।शिवेंद्र कुमार सिंह और गिरिजेश कुमार जो मूलतः पत्रकार हैं उनके द्वारा यह एक रचित रोचक प्रशंसनीय कृति है। "रागगिरी" पुस्तक में संगीत की कुछ बुनियादी बातों को समाहित करते हुए 66 रागों को आधार बना कर ढले लोकप्रिय गीतों का जिक्र है तो वहीं  पुस्तक को अधिक पठनीय बनाने के लिए उस गीत- संगीत ,गायक या अन्य  किस्म के  संबंधित जुड़े किस्से सम्मिलित किये गये  हैं जिससे पुस्तक  की रोचकता में वृद्धि  हुई है।कुल मिलाकर दोनों ही पुस्तकों ने मुझे शास्त्रीय संगीत पर नई जानकारी  दी सो आपसे इन्हें मुखातिब  कर  रहा हूॅ।

Saturday, 2 November 2019

गज़ल-265:अपने ही शहर में

अपने ही शहर में हमें तो कोई भी जानता नहीं।
रहे किसी के कातिल नहीं सो पहचानता नही।।
ये सच नहीं कि मैं झूठ कभी बोलता नहीं।
हाँ किया हो वादा तो फिर पीछे हटता नहीं।।
भीड़ तो बढ़ रही खूब जहीन आलिम फाजिलों की। मुश्किल यही कि आदमी अब भी कोई मिलता नहीं।।
आँख से दर्द है कि बढ़ता ही जा रहा बिछुड़ने का। 
हद ये है आँख से एक भी कतरा क्यों रिसता नहीं।। 
मुद्दतों बाद मिले हैं उनसे तो दुआ-सलाम भी हुई।
जाने क्यों फिर भी रिश्ता पुराना सा महकता नहीं।।
लिखने को तो लिखता रहा हूँ खोल कर अपना दिल।
तौबा मगर जज़्बात कभी भी मैं अपने बेचता नहीं।।
समझाता था उन सबको उनके ही भले की बात मगर।
"उस्ताद"की बात पर अमल यहाँ कोई करता नहीं।।
@नलिन#उस्ताद

Friday, 1 November 2019

गजल-264:चेहरे से हटा कर जुल्फें

चेहरे से हटा कर जुल्फें फिर बार-बार गिराते हैं।
अपनी अदाओं से कातिल वो तो बस जलाते हैं।।
बहुत गुरूर है अपने जिस्म की रानाई* का।*सुन्दरता 
तभी तो हुजूर हमें भाव बहुत दिखाते हैं।।
निगाहों से निगाहों का पैमाना टकरा के जो है छलका।
इल्जाम देखिए अब किस पर ख़ूबसूरती से लगाते हैं।।
मिलाते नहीं निगाह ये भी एक अजब किस्सा रहा।
गैर की पर आड़ ले अक्सर वो हमें ही सुनाते हैं।।
ठुकरा दिया अपना जिन्हें शागिर्द बनाने से। 
वही खुद को अब असल "उस्ताद" बताते हैं।।
@नलिन#उस्ताद