Thursday, 21 July 2016

भारत में खाते-पीते,नसें वतन की काट रहे


जिस शाखा में कूद-कूद कर उछल रहे
बौराए मर्कट उस शाखा को ही तोड़ रहे।
बुद्धिजीवी,सेक्युलर का हरदम छद्म वेष धरे
भारत में खाते-पीते,नसें वतन की काट रहे।
वोट-बैंक की खातिर नेता ये मंझे हुए
फसल घृणा-द्वेष की हैं समाज रोप रहे।
राष्ट्रप्रेम का नित मिथ्या नाटक रचते
सर से पाँव घोटालोँ में खूब सने रहे।
दुनिया थू-थू करती तो बला से किया करे
गद्दारों संग रस ले मुर्ग-मुस्सलम तोड़ रहे।
मुद्दे भटका,उल्लू अपना सीधा करते
जैसे-तैसे गठरी इनकी बस भरी रहे। 

Wednesday, 20 July 2016

कारे बदरा देखो झूम रहे गगन में





कारे बदरा देखो झूम रहे गगन में 
 सबके मन-मयूर नाच रहे धरती में। 
प्यासी धरती भी परम तृप्ति की आस में 
मुदित बटोरे रजत बूँद अपने आँचल में। 
मीन,मकर,जलचर सब अति आनंद में 
पशु,पंछी उल्लसित विचर रहे आकाश में। 
नौजवान भर रहे स्वप्न नए आगोश में 
वृद्ध झाँक रहे पुलकित भीतर अतीत में। 
बाल-वृन्द संतुष्ट कागज़ की नाव चलाने में 
कृषक व्यस्त हैं स्वर्णिम भविष्य बुआई में। 
साधक जीवन कृत-कृत्य चौमासे में 
हरी कृपा जब बरस रही उर आँगन में। 


Sunday, 17 July 2016

राम जी से विनती



तू तो है भाव का भूखा
मैं रसहीन शुष्क हूँ।
तू पर कातर कृपा पुंज
मैं स्वार्थ में निबद्ध हूँ।
सब हैं जब तेरे अपने
मैं खुद में क्यों निमग्न हूँ।
तू है जब भला भक्त सबका
मैं कहाँ कैसा भक्त हूँ।
हर साँस पर तेरा नियंत्रण
मैं कहाँ करता कुछ कर्म हूँ।
यूँ ही कृपा करते रहना सदा
मैं तो बस तेरा एक क़र्ज़ हूँ। 

राम जी से विनती



तू तो है भाव का भूखा
मैं रसहीन शुष्क हूँ।
तू पर कातर कृपा पुंज
मैं स्वार्थ में निबद्ध हूँ।
सब हैं जब तेरे अपने
मैं खुद में क्यों निमग्न हूँ।
तू है जब भला भक्त सबका
मैं कहाँ कैसा भक्त हूँ।
हर साँस पर तेरा नियंत्रण
मैं कहाँ करता कुछ कर्म हूँ।
यूँ ही कृपा करते रहना सदा
मैं तो बस तेरा एक क़र्ज़ हूँ। 

Saturday, 16 July 2016

IS ISLAM A TERROR ? Small hindi poem

इस्लाम क्यों कर दहशतगर्दों का दीने इलाही है बन रहा
मुफलिसी,बेरोज़गारी क्यों नहीं जेहाद का सवाल बन रहा।
हरा तो रंग है हंसी-ख़ुशी ,विकास की बहार का
अज़ान को भला वो फिर रक्तरंजित क्यों कर रहा।
जब है मज़हब इस्लाम अमन, प्यार और वफा का
पेट दाढ़ी ,पैदल दिमाग क्यों बेवज़ह भाव दे रहा।
हाथ मासूम बन्दूक थमा विलायत खुद की औलाद भेज रहा
नामुराद रंगा सियार चुपचाप मुर्ग-मुसल्लम खुद तोड़ रहा।
 जमाना बुलंदियां सितारों की चूमने कदम-कदम मिला रहा
फिर क्यों हमारा एक हाथ ही फसल अंगार की रोप रहा।
इंसानियत कलप रही देख नन्हे- नन्हे फरिश्तों का शव
"उस्ताद " हैवान है तू कलेजा मुंह नहीं जो आ रहा। 

Friday, 15 July 2016

गुरु तेरे श्री पुण्यधाम (गुरु पूर्णिमा के परम मंगलकारी दिवस पर)

गुरु पूर्णिमा के परम मंगलकारी दिवस पर जो भक्त कतिपय कारणों से अपने गुरुधाम नहीं जा पा रहे हैं उनके लिए एक छोटी कविता इस आशा से की इससे उनको कुछ सांत्वना मिल सकेगी।

गुरु तेरे श्री पुण्यधाम जो मैं चाह के आ न सका 
होगी यही तेरी रजा जो मैं चाह के आ न सका। 
वैसे तू तो बसता कहाँ नहीं है मुझे बता जरा 
मैं ही हूँ  पगला जो ढूंढ रहा एक धाम जरा। 
संभव है मेरी छुद्र सोच को मिटाना चाह रहा 
 अब मिलने को मुझसे तू ही लगता आ रहा। 
वैसे तो तेरा घट-घट,जीव-जीव में वास हुआ 
जो भी देखूं,जहाँ भी जाऊं तेरा ही भाव हुआ। 
श्री चरनन बस प्रीत रहे बस ऐसी तू कृपा चला 
भेद - बुद्धि रहे न मुझमें ऐसी अब तू हवा चला। 
मेरी डोरी तेरे हाथ,ले तू  डोरी अपने हाथ सदा 
यही याचना,यही प्रार्थना करता हूँ करबद्ध सदा। 

                                                                  

Thursday, 14 July 2016

पुरुष ठूंठ है यदि प्रकृति की कोमल छाँव नहीं है


प्रकृति तू तो लगता हम सबसे रूठ गयी है
जान रहा,तू हम सबसे मुख मोड़ रही है।
कहीं पड़ रहा सूखा,अकाल तो बाढ़ कहीं आयी है
 जाड़ों में अति ठण्ड तो,गर्मी कहीं बेहाल पड़ी है।
हिम-आलय के शिखरों की हिम गलती जा रही है
ऋतुराज बसंत की तरुणाई भी ढलती जा रही है।
ओजोन परत की चमड़ी नित ही गलती जा रही है
देखो अब तो सांस भी लेने में मुश्किल आ रही है।
तेरा आक्रोश हम पर यूँ ही बेवजह नहीं है।
रखूँगा अब तेरा मान वचन खरा यही है।
कृपा बनाए रखना अपनी तुझसे मनुहार बड़ी है
पुरुष ठूंठ है यदि प्रकृति की कोमल छाँव नहीं है।