Saturday, 7 June 2014

ग़ज़ल 26



मेरी फितरत कोई हंसी-खेल नहीं ये समझना होगा।
जीने के लिए मुझमें डूब के तुझे खुद को मिटना होगा।। 

जिंदगी के रंजोगम हर सुबह-शाम निभाते हुए।
खुद के आईने ही में खुद को संवारना होगा।। 

दोस्त,दुश्मन के खाँचों से अलग हटकर। 
अब खुद का एक चेहरा तलाशना होगा।। 

बाँहों में समा हमनशीं बनाने से भला क्या होगा। 
बटोरने को मोती तुझे समंदर तो नापना होगा।।
 
माना हम तेरे प्यार के लायक नहीं बने।
किसी से दिल लगा मगर तुझे तो रहना होगा।।

रोशनी दिखेगी कहाँ ऐसे तुझे परवरदिगार की। 
ऑखों में खुद को"उस्ताद" हर वक्त सहेजना होगा।।  

Thursday, 5 June 2014

श्री साईं स्त्रोत








श्री गणेश प्रथम पूज्य तुम, कृपा करो विशेष।
श्री साईं चरित कहूँ जो हरे पाप भय क्लेश।।



जय श्री साईं जय भगवंता,तुम हो साक्षात गुरु रूपा। 
अद्भुत गूढ़ रूप त्तुम्हारा,जानूँ कहाँ बिन कृपा प्रसादा।
सो अब करो साधन कुछ ऐसा,गर्व करूँ बन जौऊं चेला। 
जगत प्रपंच घेरे बहु भांति,मैं तू हूँ फिर और अनाड़ी। 
बार-बार उकसाए मोहे माया,छल,कपटी,दम्भी यह काया। 
धरम -करम सब ही छुट जाते,आलस-मत्सर प्रीत बढ़ाते। 
काम-क्रोध,मद अवगुण नाना,भीतर-भीतर सेंध लगाते।  
तू अब करो विलम्ब न देवा,बन जाओ अवलम्बन मेरा। 
मैं तुमको तुम मुझको देखो,भाव रहे फिर कौन अधूरो। 
श्री चरनन प्रीति लग जाये,जीवन सफल मेरो होइ जाये।
तुम तो प्रभु जगत के स्वामी,व्यथा हरो अब अन्तर्यामी। 
कोटि-कोटि रवि तेज तुम्हारा,ह्रदय मृदुल "नलिन"सा प्यारा। 
मैं क्यों रह जाऊँ अकेला,हाथ पकड़ लो अब तुम मेरा। 


श्री साईं सद्गुरु तुम,खोलो ज्ञान द्वार।
 राह कठिन भवसागर की उतरे बेडा  पार।।

वेष फ़कीर साईं तेरा,मुझे मन भाया। 
अलख रमाई "शिर्डी"में,वेष बदल कर आया।।
तेरो रूप तू ही भेद जाने,मुझे प्रीत रस दे दे। 
नाटक करे भिक्षुक के जैसे झोली मेरी भर दे।।

अवतारों में अवतार श्रेष्ठ, तू तो है एक साईं।
विमल बनाने आया मुझको फिर विलम्ब क्यों साईं।।
चिलम में जलें अवगुण सारे,कश ऐसे तू ले ले।
"उदी"काया-कल्प करे मेरा,सब विकार तू हर ले ।।

Tuesday, 3 June 2014

साक्षात् बजरंग (नीबकरोली बाबा)

साक्षात् बजरंग को,तेरो मंगल रूप।
मिटा हिय अज्ञान,कर दे आत्मस्वरूप।।

जय-जय नीबकरोली बाबा।
कैसा न्यारा तेरा रुतबा।।

जगह-जगह हर रूप में दिखता।
वरद -हस्त सब पर तू रखता।।  
                                      
प्यारा, मोहक रूप जो तेरा।                                  
ध्यान आकर्षित करता मेरा।।

भक्त की इच्छा पूरी करने को।
छोड़ते देखा मुख-ग्रास को।

जब तू अपनी मौज में आता।
अदभुत कौतुक पल में रचता।।
                              
शिव-हनुमान,ईश सरीखा ।
परम रूप भक्तों ने निरखा।।

शिव रूप में ध्यान सिखाता।
राम-राम कह मुक्ति दिलाता।।

नष्ट करे सब रोग और पीरा।
हनुमत रूप जपे जो धीरा।।

बजरंगी को कियो प्रतिष्ठित।
श्वेत मार्बल नवल अधिष्ठित।।
(बाबा जी द्वारा हनुमान जी के श्वेत विग्रह की स्थापना )

देश-विदेश सब जगह विराजे।
राम भक्त का डंका बाजे।।

बाबा तेरा रूप सलोना , मुझको सदा उबारे।
निश -दिन करूँ यही प्रार्थना,मनुवा राम उचारे।।





Sunday, 1 June 2014

ग़ज़ल-18















मेरी ग़ज़ल के तार, चिटक  गए हैं।
क्या गाऊँ यार ,सुर बहक गए हैं।।

नगमे थे जो गाते,कभी बार-बार।
मायने आज उसके ही खटक गए हैं।।

सींचा जो खेत लहू से,फसलों के लिए।
सारी रकम तो जमींदार झटक गए हैं।।

जिस रोशनी के लिए लड़े थे ताउम्र हम।
आज लूटेरे ही वो बन दीपक गए हैं।।

चमन में फूल जो बोए बहार के वास्ते।
वही शोलों को भड़का सारे खिसक गए हैं।।

जन्नत से हंसी बना रहे थे जिसे हम।
हालात वहीं आज हो अराजक गए हैं।।

शोख़ नज़रों ने जो देखा उसके सुकून को।
लो"उस्ताद" तो और भी हो बेझिझक गए हैं।।


ग़ज़ल 19


















माहौल में आजकल आग क्या अजब बरसे।
बात-बेबात देखो हरेक बेसबब बरसे।।

बुत हो गया हूँ  लोग तो  हैं अब पूजते।
दामन में संग* मेरे क्या गजब बरसे।। *पत्थर 

अल्हड़ मिज़ाज़ बादल के अंदाज क्या कहें।
ये गरजे कहीं तो कहीं और जा सब बरसे।।

शहर में नाचते मोर भला दिखें कैसे।
बादल भी अक्सर सहमते ही जब बरसे।।

रिश्तों की बेल यूं ही सदा फलती-फूलती रहे।
जमीन पर यकीन की जो प्रीत निरालंब बरसे।।

जैसा चाहे उसे वो नाच वैसा नचा दे।
"उस्ताद" रब की मौज़ तो बस अजायब* बरसे।।  *अद्भुत