Saturday, 1 June 2024

६२०: ग़ज़ल - उजालों की तमन्ना में

उजालों की तमन्ना में क्यों अंधेरों से हाथ मिलाया। 
आख़िर दिल दिमाग तो होशो हवास में है आपका।।

कोई कभी तो खटखटा जाए मेरे घर का दरवाजा।
केवल यही सोच आनॅलाइन शापिंग हूं करने लगा।।

दोजख की आग में जल रहे हैं लोग अब खुद से।
अंजाम ये तो होना तय था नासमझ विकास का।। 

एक बूंद पानी की कदर समझ लो बरख़ुरदार मेरे।
पड़ेगा वरना बेबस मछली सा रेत पर तड़फड़ाना।।

"उस्ताद" हमारा हुनर तो हमें बखूबी पता है जान लो।
ज़िद पर उतरें तो सच में तब्दील होता है हरेक सपना।।

नलिन "उस्ताद"

Friday, 31 May 2024

ग़ज़ल: ६१९ बेसाख्ता

आंखों में जरा आप पानी तो बूंद भर रख लीजिए।
 समझ के झील कोई तैरे भी तो कैसे जरा सोचिए।।

मैंने जो लगाया था घोंसला गौरैय्या पालने के लिए।
रहने को आईं वो मगर बड़ा ठोक बजाकर देखिए।।

बहुत सोचता हूं उसके लिए जान न्योछावर कर दूं।
मगर वो बनती ही नहीं मेरी जान क्या करूं कहिए।।

प्यार मेरा एक राज था तो भला उसे कैसे बयान करता।
निगाह पढ़ने का था बहुत उसे तजुर्बा तो क्या कीजिये।।

बेसाख्ता  खुद को ही दाद दे देता हूं अब तो मैं अक्सर।
"उस्ताद" जब और कोई न पूछे तो भला क्या कीजिए।।

नलिन "उस्ताद" 

Thursday, 30 May 2024

६१८: ग़ज़ल -सुर्खाब सा इतराना अच्छा नहीं

हर बात पर सवाल करना अच्छा नहीं।
जान के भी अंजान बनना अच्छा नहीं।।

नतीजे जब साफ दिखते हों उतार के भी ऐनक।
किसी पर ठीकरा हार का फोड़ना अच्छा नहीं।।

मेहनत मशक्कत में कहां मुकाबले करोगे उससे। 
भरी दुपहरी मुंगेरी से‌ सपना देखना अच्छा नहीं।।
 
माना सफर है अभी भी दूर नंगे पांव चलने का। 
थक-हारकर तकदीर को कोसना अच्छा नहीं।।

मुकाबले में हो तो ज़रा ज़मीर अपना बचाकर रखो।
"उस्ताद" हर बात सुर्ख़ाब सा इतराना अच्छा नहीं।।

नलिन "उस्ताद"

Wednesday, 29 May 2024

६१७: ग़ज़ल : ये आपकी इनायत के दर्शन हमें आपके हो गए

ये आपकी इनायत,के दर्शन हमें आपके हो गए।
वरना तो अपने दिन, यूं ही फाकों में थे कट रहे।।
सोचा कि चलो कुछ देर सुस्ता लें कुछ देर ठहर कर। 
मगर कहां नसीब में अपने अब दरख़्त थे बचे हुए।।
कसम से तुम जो भी हो कर रहे ये अच्छा नहीं है।
कलम छोड़ कुल्हाड़ी जो हाथ में थाम चलने लगे।।
मोबाइल चलाने में ही सारा वक्त खर्च कर दिया।
अब नसीब पर क्यों बेवजह इल्जाम लगे थोपने।।
हर शख्स यहां "उस्ताद" तेरा दिवाना बताता है खुद को।
ये अलग बात है कि परवाने सा जुनूं लिए कुछ ही दिखे।।
नलिन "उस्ताद"

Friday, 17 May 2024

६१६: ग़ज़ल: आप जलकर राख हो गई

दुखड़ा लेकर गई भी कहां सुनाने किस ख़तीब* से।*मौलवी 
आप ही जलकर हो गई वो राख जिसके करीब से।।

करवा रहा हूं प्यार का इज़हार नक़ीब* से।
*डुग्गी पीटने वाला 
सुना है कि वो बिफर गया है मेरे रक़ीब से।।

तल्ख मौसम के चलते स्याही कलम की जो सूखी थी। उम्मीद है पुरजोर बहने लगेगी फिर दिल के करीब से।।

ये दिल के घाव भरते नहीं कि फिर लगते हैं रिसने।
सो सोच रहा करवा ही लूं इलाज लगकर तबीब* से।।*डाक्टर 

हर एक से होती है गुस्ताखियां चाहते न चाहते भी। 
रूठ कर भला कोई कब तक बैठे अपने हबीब* से।।*प्रेमी

ये काली आंधियों के बादल छत पर गड़गड़ा रहे हैं।
हुज़ूर जाकर सुनिए कुछ शेर "उस्ताद" ए हबीब से।।

Sunday, 21 January 2024

श्रीराम विराज गए श्री अयोध्या धाम में

श्रीराम अर्धसहस्त्राब्दी पश्चात,अंततः "विराज" गए अपने‌ जन्मस्थान में।
अयोध्याजी षोडश-श्रृंगार कर,अद्भुत कान्तिमय सज गई अल्पकाल में।।
देव,गंधर्व,यक्ष,मानव उमड़ पड़े सभी,फिर तो यहां अप्रतिम उल्लास में।
शंख,ढब,शहनाई,तुतरी बजने लगे सब,वाद्य-यंत्र पुरजोर स्वतः उत्साह में।।
मेघ श्याम सदृश राम के,अमृत-रस-भरे पग पड़ रहे,जब वर्षों तपी उर भूमि में।
आह्लादित क्यों न नर्तन करे,समस्त सृष्टि फिर भला इस विलक्षण कालखंड में।।
नव अभ्युदय हमारी मात्रभूमि का,श्रीगणेश सिद्ध है अब बात की बात मैं।
श्रीराम के आगमन से,नींव पड़ने लगी देखो,रामराज्य की हमारे भारतवर्ष में।।
जनता-जनार्दन ऊंच-नीच मिटा सब,तालबद्ध गायेगी प्रमुदित,अब एक तान में।
विश्वगुरु, सिरमौर बन पुनः उभरेगा राष्ट्र हमारा,एक नूतन
परिधान में।।

नलिन पाण्डे " तारकेश"

Tuesday, 21 November 2023

615: ग़ज़ल:कुछ नादानियां

कुछ नादानियां तो हमारी जग जाहिर हो चुकीं।
मगर बहुत अभी भी हमने छुपाके हैं रखी हुई।।

यार वैसे सच कहूं तो तुम यकीन कर भी लेना। 
नासमझी कुछ ऐसी हैं जो हमसे भी छुपी रहीं।।

तेरी समझदारी पर है शक-ओ-शुब्हा तो नहीं हमें।
तभी उम्मीद है ये राजे-बात तेरे लिए कतई नहीं।।

दिल खोलकर रखना अच्छा है ताउम्र दोस्ती को।
ये अलग बात है आज कद्र नहीं ऐसे जज़्बात की।।

सफ़र में चलते-चलते अकेले,थक गए हैं हम बुरी तरह।
"उस्ताद" चलो देखें मगर तकदीर में क्या कुछ है लिखी।।

नलिन तारकेश @उस्ताद