Friday, 26 May 2023

531:- ग़ज़ल:- दर्द से भरी हैं

पता है दर्द से भरी हैं राहें मुहब्बत की।
ये बन गई है मगर अब मजबूरी हमारी।।

आने का वादा करके भी वो आए नहीं कल।
दरअसल ये किस्मत भी है करती दग़ाबाज़ी।।

वक्त भी ये कसम से कम जालिम है नहीं।
साथ में उनके है इसकी सांठगांठ पुरानी।।

ख्याली बादलों की,दिल-ए-आसमां पर आवा-जाही।
खूबसूरत तस्वीरें बनाकर उनकी,हमको है दिखाती।।

तमाम खबरें दुनिया भर की पता तो हैं मुझे।
यारब बस एक खबर अपनी ही मिलती नहीं।।

"उस्ताद" नाउम्मीदी भी इस कदर गहरी न पालो।
राख के नीचे सब्र से देखो तो सही,मिलेगी चिंगारी।।

नलिनतारकेश @उस्ताद 

Wednesday, 24 May 2023

530: ग़ज़ल:- मुस्कुराओ

अमां यार आओ जरा तो मुस्कुराओ।
रोनी सूरत को अब छोड़ो,मुस्कुराओ।।

दो जरा सी जुंबिश अपने लबों को तुम।
हाँ बस इन्हें ऐसे ही खोलो,मुस्कुराओ।।

ईज़ाद जब से ये दुनिया हुई है,यूँ ही चली।
सुनो सबकी पर मन की करो,मुस्कुराओ।।

रास्ते में मिलो सबसे या कि एकला चलो।
न दे सको खुशी पर खुद तो,मुस्कुराओ।।

समय बदलते देखा है भला किसने कहो तो।
"उस्ताद" कल की जरा न सोचो,मुस्कुराओ।।

नलिनतारकेश@उस्ताद 



Tuesday, 23 May 2023

529: ग़ज़ल:- किसी से मिलने पर

किसी से मिलने पर बहुत ही थक जाता हूँ मैं।
गम की गठरी दरअसल उसकी ले आता हूँ मैं।।

मुलाकातों से बचने की जो आदत है बस इसीलिए।
ये हल्का अपना ही बोझ भी कहाँ उठा पाता हूँ मैं।।

आ जाओ कभी यहाँ झाँको तो सही दिले रानाइयों में।
दर्द-ए-तकलीफ में कैसे खुलकर ठहाका लगाता हूँ मैं।।

इनायत खुद्दारी की उडेली जो खुदा ने भरकर मुझपर।
सो कहीं हाथ फैलाने से पहले खुद ही रोक लेता हूँ मैं।।
गालिब,मीर फन-ए-सुरूर चढ़ रहा "उस्ताद" तुझमें। 
ग़ज़ल ओढ़ूं ,बिछाऊं हर घड़ी बस यही सोचता हूँ मैं।।

नलिनतारकेश @उस्ताद 

Monday, 22 May 2023

528: ग़ज़ल-रूठता हूँ जब कभी मैं

रूठता हूँ जब कभी मैं तुझसे तो मनाता भी नहीं है।
हकीकत न सही ख्वाब भी रंगीन तू दिखाता नहीं है।।

हर कोई थक-हार करता है सजदा दर पर तेरे आकर।
मैं तो झुका हूँ एक मुद्दत से मगर तू पुचकारता नहीं है।।

तेरी हरेक अदा का मुरीद रहा हूँ सुन रसीले सरकार मेरे।
जाने मुँह फैलाए किस बात फिर पहलू में बैठाता नहीं है।।

हो सकता है हो गई हो कोई खता बड़ी भारी मुझसे।
आकर जाने फिर भला क्यों मुझको बताता नहीं है।।

राजे दिल तुझसे नहीं तो भला जाकर कहूँगा किससे।
छोटी से ये बात जाने "उस्ताद" क्यों समझता नहीं है।।

नलिनतारकेश @उस्ताद 

Sunday, 21 May 2023

527:ग़ज़ल:- दुआओं से चंगा

दुआओं से चंगा हुआ जाए ये तो समझ हमें आता है। 
दवाओं से तो महज बस रंगत-ए-रोग बदल जाता है।।

हर शख्स अपनी बोली में खूब करता गुफ़्तगू जानवरों से।
वो समझ जाए मगर आदम कहाँ आदम को समझता है।।

फासले से मिलो,सुकून रखो,हर हाल बस मस्त रहो। 
यही नेमत है असल,आदमी जिनसे संवरने लगता है।।

लिखना जो चाहो तो लिखा जाता नहीं एक भी शेर।
हाँ जो कभी कलम बहके तो दीवान लिखा जाता है।।

देखो आज एक ताजा ग़ज़ल लेकर सबसे मुखातिब हुआ।
सूरज,चांद नहीं,असल हकीकत "उस्ताद" बयां करता है।।

नलिनतारकेश @उस्ताद

526:ग़ज़ल:-बगैर बहके

भला रुख से उन्हें नकाब क्यों हटानी चाहिए।
देखने को तिलिस्म कूवत भी तो होनी चाहिए।।

हर बात में शह-मात की बिसात बिछा दांव चलना।
कुछ तो अपनी तहजीब-ए-सादगी बचानी चाहिए।।

रंग में अपने शौक से अलमस्त गुजारो जिंदगी।
खुदा के लिए शुक्रगुजारी मगर रखनी चाहिए।।

मसरूफियत में रहते हो चलो ये दौर ही ऐसा है।
कभी हाल-ए-तबीयत घर की भी पूछनी चाहिए।।

मयखाने में लड़खड़ाते हैं कदम हर किसी के "उस्ताद"।
बगैर बहके सर से पाँव नशातारी बनी रहे मुबारक मेरी।।

नलिनतारकेश@उस्ताद 

Thursday, 18 May 2023

525:ग़ज़ल:-तेरे दर पर

तेरे दर पर बीत जाए अब ये उम्र सारी।
बस यही रह गई है आरजू एक हमारी।।

हवाओं का रुख बदल देता है हारी हुई बाजी।
तलवार में सान रखना इसलिए ही है जरूरी।।

कहाँ खो गया वो किन ख्यालों में खुली आंखों से।
सोचो कुछ तो बात है जो दिल में गहरे मचल रही।।

एक तसव्वुर जाने कितने जन्मों से बहता चला आया।
हकीकत बना आज तो जाने कैसे हमें झपकी आ गई।।

"उस्ताद" जलवा-ए-फ़न तेरा सितारों सा चमक रहा।
बारीकी से मगर देखने को निगाहें तो चाहिए रूहानी।।

नलिनतारकेश @उस्ताद