Tuesday, 9 August 2022

444: ग़ज़ल:

चलो आज फिर एक ग़ज़ल लिखी जाए। 
दर्द की सिलवटें कुछ और मिटा दी जाए ।।

बहुत गुमान था जिसकी दोस्ती का हमको।
अब उसकी ही सबसे बेवफाई छुपाई जाए।।

कोई सोता नहीं रात भर इतने पेचोख़म* हैं जिंदगी में।
*मुश्किल हालात 
करीब जाकर अब जरा लोरी तरन्नुम* में सुनाई जाए।।*गाकर

रिमझिम बौछारें जब भिगोती हैं दरीचे* से आकर।*खिड़की 
संग यार दोस्तों के शम-ए-महफिल जलाई जाए।।

हर किसी को है गुमान कि वो ही "उस्ताद" है।
पहले चलो ये खुमारी खुद की ही उतारी जाए।।

नलिनतारकेश @उस्ताद

Monday, 8 August 2022

443:गजल

किसी की जिंदगी को क्या खाक हूँ बदल सकता मैं।
चाहत है बस लबों को कुछ देर को खिला दूं जरा मैं।।

हर शख्स जेहन में अपने घूमता है मनों बोझा लादे हुए।
क्या कभी कम कर सकूंगा तोला-माशा भी उसका मैं।।

अलहदा है हर कोई और यूँ कहो तो कोई भी नहीं।
अजब ये भूलभुलैया को कभी ना समझ पाया मैं।।

उफनते जाम भी संभल जाते हैं हलक में जाने के बाद। संभलता नहीं मगर जब छलकने पर आता है मेरा मैं।।

खुदा का बड़ा रहमो-करम है जो नजूमी हुआ "उस्ताद"।
भरके हौसला जुगनू ए रोशनी का मुस्तकबिल बनाता मैं।।

नलिनतारकेश @उस्ताद

Sunday, 7 August 2022

442:गजल

रंग जुदा-जुदा हैं कितने ज्यादा इस जिंदगी के।
नाप सकें तो जरा बताइए हमें माप गहराई के।।

हर तरफ चर्चा है बस तेरे नाम की शहर भर में।
कुछ हमें भी तो सिखाइए फन इस कारीगरी के।।

पत्तों में पड़ी बूंदें,मोती सी दूर से चमकती हैं।
किस्से अजब-गजब हैं कुदरत ए निजामी के।।

तुम हमें चाहते हो ये पता तो है यारब दिल से।
बीतें न मौसम कहीं चलते तेरी बहानेबाजी के।।

सुनहरे हर्फ कोरे कागज पर दिल के टांक दिए हमने। जगमगाते रहे नगीनों से ता-उम्र निगाहों में सभी के।।

"उस्ताद" काले घने बादल बेताब हैं बरसने को।
खोलो तो जरा बंद पड़े पल्ले अपनी खिड़की के।।

नलिनतारकेश @उस्ताद

Saturday, 6 August 2022

441:गजल

ख्वाब देखने में ही यूँ तो अपनी सारी जिंदगी गुजर गई।
खुदा का शुक्र है फिर भी अब तलक अच्छी गुजर गई।।

यूँ कहें तो दरअसल एक ख्वाब ही तो है जिंदगी।
दो पल भी ठहरी नहीं चुटकी बजाती गुजर गई।।

कुछ लम्हे को ही ठहर जाए काश कभी इत्मिनान से।
देखते ही देखते पर देखिए जवानी,बुढ़ोती गुजर गई।।

अब पेशानी पर बल देकर हाथ मलने से क्या होगा कहो।
सदाकत*,रफाकत** भरी वो पूरी की पूरी पीढ़ी गुजर गई।।* सच्चाई  **मेलजोल 

होता तो होता कैसे दुनियावी प्यार "उस्ताद" कभी किसी से।
मौसम ए उम्र आने से पहले खुद से ही शनासाई* गुजर गई।।*परिचय 

नलिनतारकेश उस्ताद

Thursday, 4 August 2022

आजादी का अमृत महोत्सव

भगत शिरोमणि सन्त
तुलसीदास जी महाराज को उनके पावन-पुनीत जन्म दिवस पर "आजादी के अमृत महोत्सव" पर सादर काव्यांजलि  समर्पित है।आपकी एक कालजयी रचना "श्रीरामचरितमानस" जी ने भारत के जन-जन  में "पराधीन सपनें सुख नाहीं" का जो अप्रतिम  अमूल्य योगदान भरा उसका स्मरण  अभिनन्दन  करते हुए।
🙏🥰🚩जय श्रीराम।। जय हनुमान।।

राष्ट्र की "आजादी के अमृत-महोत्सव" का देखिए, श्रीगणेश हो रहा। 
जन-जन की चेतना में,गरिमामयी अतीत का नवबोध हो रहा।।

अपना रक्त-स्वेद बहा,परतंत्रता की बेड़ियों को जिन्होंने काट डाला।
आज उन समस्त राष्ट्र-भक्तों का,कृतज्ञ-भाव से स्मरण हो रहा।।

जिस दीर्घ दासता ने लोप कर दी थी,हमसे ही हमारी   तेजस्वी गरिमा।
उसकी ही पुनर्प्रतिष्ठा को,नव-उमंग से सृजन का प्रयास हो रहा।।

वसुधैव-कुटुंबकम की युगों से,चली आ रही जो अपनी उदात्त भावना।
सबके मंगल कल्याण हेतु,उसी जयघोष का समवेत आवाह्न हो रहा।।

घर-घर तक सभी के विकास की,गंगा सतत निर्बाध बहती रहे।
जाति,पंथ,सम्प्रदाय से भरा पथ,बंधनों से मुक्त अब समतल हो रहा।।

ज्ञान की जो,अपरिमित थाती रही थी हमारी,युगों-युगों से सदा ही। 
उसे ही संवारने,वृहद "राष्ट्र-यज्ञ" का संचालन,प्रति श्वास अब हो रहा।।

नव कीर्ति की स्थापना संग,"स्वर्ण-हंस" बने फिर से, अपना भारत महान।
शांति,प्रेम,त्याग की मधुर धुनों के संचार से,हर हृदय जागृत हो रहा।।

नलिनतारकेश

Wednesday, 3 August 2022

440:गजल

दर्द सुन ले बस यहाँ एक आदमी,आदमी का।
फकत इतनी ही चाहत से है अपना तो वास्ता।।

जुल्फों के घने जंगलों में खो गए जब हम।
मिलना कहाँ था कहो फिर कोई भी रास्ता।।

बेकरारी तो दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है।
जाने उनसे कब हो सकेगा आमना-सामना।।

तेरा शहर भी ढल गया है अब तो तेरे ही रंग में।
देता नहीं तवज्जो जब तक न हो कोई फ़ायदा।।

"उस्ताद" हम भी कब तलक करते उनकी चिरौरी।
आंखिर कभी तो सही जागना ही था जमीर अपना।। 

नलिनतारकेश @उस्ताद

Monday, 1 August 2022

439:गजल

बिछड़ने को तो मुझसे बिछड़ गया है वो कहने को। 
आया मगर और भी करीब देखो वो साथ रहने को।।

आंखें लड़ा के इश्क कीजिए उससे जी भर के।
जमाने में यूँ तो बहुत कुछ है यारब बहकने को।।

दर्द मिला है जो बड़े नसीब से आपको जिंदगी में।
उठाना है लुत्फ तो न जताइए भूलकर जमाने को।।

दौर एक अजब कसक बन पेशानी पर जा के ठहरा है।
मिल कर भी होगा क्या जब रहा नहीं कुछ सुनाने को।।

बहुत हो गया "उस्ताद" फसाने कब तक लिखें। 
लोरी सुनाने कोई तो आ जाए अब हमें सुलाने को।।

नलिनतारकेश @उस्ताद