Wednesday, 15 July 2026

६७७: ग़ज़ल (१५/७/२६) उसकी वफ़ा का

उसकी वफ़ा का बता कैसे मैं यकीं कर लूं।  

ये पांव क्यों अपना दलदली जमीं कर लूं।।


चेहरे से तो वो सच में बड़ा मासूम दिखता है।कांटों भरे गुलाब से भला कैसे दोस्ती कर लूं।।


उम्मीद की दहलीज पर रोज रोता ही रहा हूं।
लांघ के मगर पार कैसे अब ये गली कर लूं।।

लिखे थे मुझे जो खत मोहब्बत में उसने कभी।
चलो आज उनको ही जला कुछ रोशनी कर लूं।।

"उस्ताद" जो हुआ हो कभी खुद का ही नहीं।
भला अपनाने की उसे कैसे मनौती कर लूं।।

नलिन "उस्ताद" 

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