उसकी वफ़ा का बता कैसे मैं यकीं कर लूं।
ये पांव क्यों अपना दलदली जमीं कर लूं।।
चेहरे से तो वो सच में बड़ा मासूम दिखता है।कांटों भरे गुलाब से भला कैसे दोस्ती कर लूं।।
लांघ के मगर पार कैसे अब ये गली कर लूं।।
लिखे थे मुझे जो खत मोहब्बत में उसने कभी।
चलो आज उनको ही जला कुछ रोशनी कर लूं।।
"उस्ताद" जो हुआ हो कभी खुद का ही नहीं।
भला अपनाने की उसे कैसे मनौती कर लूं।।
नलिन "उस्ताद"
Wah उस्ताद wah
ReplyDeleteअति सुन्दर
ReplyDeleteWah very nice
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