Thursday, 9 July 2026

६७६: ग़ज़ल (९/७/२६)

रिश्ते आज सारे रसातल में धकेले जा रहे।
पर जान कर भी हम अनजान बने जा रहे।।
भरोसा,एतबार किस पर कितना करें यारब।
दो टके में यहां तो लोग ईमान बेचे जा रहे।।
नया दौर है सो अफसाने भी हैं अब अलहदा।
नई रवायतों के नाम पर बस भटकाए जा रहे।।
हरे-भरे दरख़्त काट जो कुदरत को जख्म दिए।
बगैर बरसे काले बादल अंगूठा दिखाते जा रहे।।
एक नई सुबह सजाने की कवायद यूं हो रही है।
बड़े उस्तादों के किले भी बेखौफ ढ़हाए जा रहे।।

नलिन "उस्ताद"



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