Saturday, 18 July 2026

६७९: ग़ज़ल (१८/७/२७)

दुआएं दी मैंने जिसे बद्दुआ उसे दूं भला कैसे। दिल तोड़ने की मगर फिर उसे दूं सजा कैसे।।

खेतों से मेंढ़ें तो सब हटाते दिख रहे हैं लोग।
फसल बर्बाद हो रही तो अब कोसना कैसे।।

सही वक्त है और लोहा भी लाल‌‌ गरम दिख रहा। हो भला ज़र्ब* हथौड़े का तो उसपे सोचना कैसे।।
*प्रहार 
दिले सागर प्यार का ज्वार भाटा जो उठ गया तो। 
कहिए पूनम का चांद देखना छोड़ना होगा कैसे।।

मतवालों की बस्ती में लीजिए "उस्ताद" भी आ गया। 
दुनियावी रवायतों को अब कौन संभाल सकेगा कैसे।।
नलिन "उस्ताद" 


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