Friday, 31 July 2026

६८२: ग़ज़ल ३१/७/२०२६

सोचता हूं इन हवाओं के झोंकों में घुल पाऊं मैं।
चुपचाप कभी तेरे आंचल में आकर सो जाऊं मैं।।

होता रहे बस दीदार तेरा ख्वाब या हकीकत में।
कसम से इसके सिवा और कुछ भी ना चाहूं मैं।।

चाहतें थीं जो हजारों,बेहिसाब दुनिया में मेरी।
तू ही बता एक रोज में ही कैसे भुला सकूं मैं।।

पगडंडियां भी ओझल हो गई हैं अब तो यहां। 
अंधेरे बियाबान कैसे बगैर तेरे रोशनी पाऊं मैं।।

जो है बेहिसाब तेरी रहमत नाचीज़ "उस्ताद" पर। 
भला उसे कैसे चंद लफ़्ज़ों में बता सकता हूं मैं।।

नलिन "उस्ताद "


No comments:

Post a Comment