Monday, 27 July 2026

६८१: ग़ज़ल: २७/७/२६

दर्दे दिल की दास्तां कहो कब‌ तक सुनाएं।
चलो किसी और के घाव में मरहम लगाएं।।

जो गम हमबिस्तर हो चुका है अब हमारे। 
कुछ करें कि किसी और को न वो सताए।।

जो बरसात न होए सावन के महीने मेंतो।
आंखों से चलो हम अपनी ही आंसू बहाएं।।

तुम आ सको तो आ जाना अगर दिल करे। 
अब कब तलक हम राह में आंखें बिछाएं।।

थक गए हैं बेरुखी से जिंदगी की अब तो हम।
बेवजह फिर कब तलक और पतवार चलाएं।।

दुनिया का चलन तो सदा बेहयाई का रहा है।
भला फिर उस पर "उस्ताद" क्यों सिर खपाएं।।

नलिन "उस्ताद"

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