Monday, 29 April 2019

132-गजल

कोई क्या बताए तुझे हुस्ने राजदार कहां है। 
ऐसा तेरी महफ़िल इल्मे तलबगार कहां है।।
इश्क और हुस्न की किस्सागोई तो आसान है।
खुद की हस्ती मिटा सके वो दिलदार कहां है।।
गिड़गिड़ाते फैला दे जो हाथ सबके सामने।
हो भीख मांगता ऐसा कोई सरदार कहां है।।
दिलों में उतर जाता है जो बंद ऑख में भी।
बता तो सही रब का मेरे इश्तहार कहां है।।
खुशियों तो खिलती हैं गम के दामन ही में।
इस दुनिया में रहती यूं सदाबहार कहां है।।
हूं महबूबा और खुद ही महबूब भी मैं तो।
भला मुझको किसी की दरकार कहां है।। बहा कर दर्द सबने मुझे खारा है कर दिया।
बनने से मगर मुझे समन्दर इंकार कहां है।।
हर कोई रोएगा"उस्ताद"की चौखट ही तो।
दरिया को हरेक पता है जलागार* कहां है।।
*समुंद्र।

131-गजल

तुम बिन ये दिन तो गुजरता नहीं है।
उजाला अब आंगन चहकता नहीं है।।
रात हो कि सुबह ये सब जान रहे।
वक्त किसी को यहां पूछता नहीं है।।
खुद ही बना ले जो बन्दा अपनी हजामत।
वक्त के किसी दौर से वो तो डरता नहीं है।।
बढती उमर के साथ जोश वही है उसका।
शौक के आगे वो किसी की सुनता नहीं है।।
पीयें है इतनी कसम से "उस्ताद" जी।
कदम हमारा तो अब बहकता नहीं है।।
नलिन@उस्ताद

Sunday, 28 April 2019

130-गजल

पारस की तरह आज उसने जो छू लिया है।
सराबोर रोशनी से पूरा मुझको किया है।।
हर सांस पर मरना और हर सांस पर जीना।
खुदा ने भी क्या अजब फलसफा दिया है।।
उसे तो है फिकर मेरी मुझसे भी ज्यादा।
तभी तो अपना उसे बनाया औलिया है।।
कड़ी धूप गुनगुनाते जो चला जा रहा।
लोग कहते हैं उसको ये पागल पिया है।। शोहरत की बुलंदियां पल में दिलाता है जो।
रसिकों का वो यार मेरा बड़ा ही रसिया है।।
आसां नहीं उसकी चौखट पर सजदा करना।
वो तरसाता दीदार को अपने तो छलिया है।।रोको ना उसे पांव में जंजीर डाल के यारों।
वो तो बहता हुआ एक मौजों का दरिया है।।
लो आज तो गजब हो गया उस्ताद देखो।
पहली बार जो उसने पहलू बैठा लिया है।।

Saturday, 27 April 2019

129-गजल

उमर हो गई फिर भी मासूमियत रही।
जिंदगी की असल ये सलाहियत रही।।
जलना तो शमां की सदा से आदत रही।
बेवजह मगर उस पर यही तोहमत रही।।
दोगेअगर प्यार तो मिलेगा खुद-ब-खुद। दुनिया की पुरानी ये तो रवायत रही।।
कीचड़ में दागे दामन बचा के खिलना।
यही तो यार नलिन की खासियत रही।।
खुदा का शुक्र मना वो जो आए मिलने।
वरना नेता में कहां इतनी शराफत रही।।
लबों से जो उन्होंने हमारा नाम ले लिया।
हुजूर उस्ताद की गजब ये इनायत रही।।
नलिन@उस्ताद

Thursday, 25 April 2019

128-गजल

लिखने को गजल पड़े जागना रात-रात भर।
समंदर भी दर्द का पड़े डूबना रात-रात भर।
बाॅहों में भरता है मुहब्बत का जायका वही।
जो पीता है आशिक यातना रात-रात भर।।
अंधेरों में दिखे बांटता वही चराग रोशनी।
तन-मन जलाए जो अपना रात-रात भर।।
बुझ गई लो ये शमां बेवफा के इंतजार में।
संजोया था इसने भी सपना रात-रात भर।।
कतई आसान नहीं डगर पनघट की उस्ताद।
करना पड़े आईने का सामना रात-रात भर।।

Tuesday, 23 April 2019

127-गजल


हाथों की लकीरों में तुझे जो सहेजना आता।
भला क्यों हमारे नसीब में ये भटकना आता।
हर तरफ है चाहतों का अंबार खड़ा।
काश हमें भी चादर ये समेटना आता।
फिसलती नहीं ये जिंदगी पारे की तरह।
तिनके-तिनके जो यार सहेजना आता।।
तुझमें-मुझमें थी भला दुश्मनी कहां।
दीगर ये बात अगर समझना आता।।
तोड़े जो हाथ उसकी भी हथेली पर।
गुलों को तो बस एक महकना आता।।
गरीब कहां वो तो है शहंशाहों का राजा।
भूखे पेट जिसे बांटना निवाला आता।।
असल"उस्ताद"तो वही है हुजूरे आला।
गमों के सैलाब है जिसे चहकना आता।।

126-गजल

लो उमर बढ़ने के साथ ही शबाब आ गया।
जो घटी तो फिर रब का जवाब आ गया।।
काली जुल्फों का जादू कुछ यूं समझिए जनाब।
असल में अब उनके पास नया खिजाब आ गया।।
सवालों पर मेरे था जो अचकचाया हुआ। 
लेकर जवाब वो मेरी ही किताब आ गया।।
जब से बना वो वजीरे आलम मुल्क का। तब से असल में यहां इंकलाब आ गया।।
खबर थी किसे बदलेगी किस्मत कुछ यूं।
कड़ी धूप वो लिए आज गुलाब आ गया।
जिस्म की झील में खिल गए हजारों नलिन*।*कमल
दिले आसमां जो खुदाई आफताब* आ गया।।*सूरज
रगड़ी जो एड़ियां"उस्ताद"अलैहीसलाम ने अपनी।
फजले खुदा रेत में जमजमे-आब* आ गया।।*मक्का का पवित्र पानी