Monday, 29 September 2014

232 - तुम्हारा  दिव्य रूप



तुम्हारा  दिव्य रूप  देखने की
प्रभु साध है मेरी बहुत पुरानी।
मंत्रमुग्ध जिस पर सृष्टि सारी
वही सगुन रूप की चाह मेरी।
नाम से ही जब है धड़कन धड़कती
फिर होगे सम्मुख तो क्या बात होगी।
रोम-रोम खिलता है आँख बहती
जाने क़ैसी प्रेम ने काया पलट दी।
शिव उर धाम बसती जो बाल छवि
राम उसी रूप की लौ मुझको लगी।
अब तो यही बस एक चाह रह गयी
शीघ्र दर्शन दो अथवा बहुत देर होगी।

Sunday, 28 September 2014

231 - स्वच्छ भारत का अभियान








करवां चल पड़ा है देखो स्वच्छ भारत का अभियान लेकर।
नयी चेतना,नए युग के निर्माण का जय हो संकल्प लेकर।।

राष्ट्रपिता के जन्मदिन पर उनका, हम सब शुभ आशीष लेकर।
श्रीगणेश करें अभियान का,उत्साह-उल्लास से लबरेज़ होकर।।

शौचालय की व्यवस्था कर सकें सबके लिए दूरस्थ गाँव तक।
मल ढोने की प्रथा अब न दिखे कहीं,किसी एक भी गॉव तक।।

नदी,सरोवर जो भी हमको मुक्त-हस्त से सदा रहे हैं जल देते।
उनको नहीं करेंगे गन्दा,आओ मिलकर ये प्रण हम सब हैं लेते।।

गली-मौहल्ले,चौबारे भी जहाँ-जहाँ हैं सब तेरे-मेरे,अपने तो हैं।
घर को जैसे चमचम स्वच्छ करें,इनको हम क्यों नहीं रखते हैं।।

शत्रु ,मित्र जो भी आए देश में अपने, विश्व के किसी भूभाग से।
खिल उठे फिर तन-मन उनका,देख रमणीय यहाँ की ठाँव से।। 

Thursday, 25 September 2014

230 - योगदान विकास में




चिरप्रतीक्षित नए युग का श्री गणेश हो गया।
मंगलयान उड़ान से राष्ट्र मंगलमय हो गया।।

उम्मीद की लौ जो थी कभी बहुत हलकी रही।
मद्धम से बढ़कर अब विशाल आकार ले रही।।

हर तरफ गूंजने लगा है जज्बा,फिर देशभक्ति का।
प्राण फूँकने लगा है चारों तरफ नेतृत्व नरेंद्र का।।

जमीनी स्तर से लेकर आसमाँ की बुलन्दियों तक।
संजीदा दिखता है इरादा राष्ट्र का नई मंजिलों तक।।

"मेक इन इंडिया" की शुरुआत बनेगी प्रगति मन्त्र।
सोने की चिड़िया फिर होगा अपना ये लोकतंत्र।।

हम भी कब तलाक हाथ बांधे रहें इस नए दौर में।
आइए जितना हो संभव करें योगदान विकास में।।

Tuesday, 23 September 2014

228 - जीन्स और हमारे पूर्वज



आश्विन मास का कृष्ण पक्ष जब-जब हर नववर्ष में  आता।
श्राद्ध क्रिया से पितरों का सुमिरन करलें ,ऐसी याद दिलाता।।

हम रहे हैं जिनके वंशज,कुल-गोत्र से सात पुश्त तक जुड़े हुए। 
उनके आशीष,तेज़पुंज से सप्तलोक में "भूलोक "तक पहुँच गए।।

मात-पिता के पितरों का,भाव से करें स्मरण यदि हम। 
प्रभू भी करें कृपादान,सदा रहे खुशहाल,तृप्त तभी हम।।

चन्द्र चमकता है गगन में जैसे,अपनी 28*नक्षत्रमाला के साथ। 
वैसे अपने पिता भी भीतर रखते,28 कला जीन्स का सदा ही साथ।।

इन्हीं 28 कलायुक्त पिंड के 21अंशों से फिर पिता है निर्मित करता। 
अपनी भावी संतति के जीन्स में तब ऐसे योगदान उसका है रहता।।

पौत्र हेतु फिर उन्हीं 21 अंशों में से जो दिए अपनी संतति को। 
15 अंश दिलवाता है अपने ही पुत्र से भावी सुकुमार पौत्र को।।

वंशवृद्धि के इसी क्रम का फिर चलता है ये सिलसिला आगे से आगे। 
10 कला के रूप में फिर मिलने से वो प्रपोत्र में बढ़ता आगे से आगे।।

उसकी फिर ये शेष 6 कलाएं वृद्ध प्रपोत्र के निर्माण में काम हैं आती। 
जिनमें से फिर 3 कलाएं अतिवृद्ध प्रपोत्र को हैं जा कर के  मिलती।।

चलते-चलते फिर इस क्रम से आगे एक कला वो अपनी है देता। 
वृद्धातिवृद्द प्रपोत्र जिसमें अपनी 7 पुश्तो के हिसाब को है रखता।।

इस तरह प्राचीन विज्ञान श्राद्ध का भाव है सूक्ष्म बड़ा अलबेला अपना।
7 पीढ़ी से संबंधों के तार जोड़-जोड़ जो करता है आया संवाद अपना।।

*27 नक्षत्रों में चन्द्रमा का संचरण होता है। वैसे मुहूर्त शास्त्र  में "अभिजीत " नाम का 28 वां  नक्षत्र मान्य है। 

Monday, 22 September 2014

227 - करुणानिधान






वात्सल्य से करुणानिधान तुम
जाने कितनों को हो उबार चुके।
पर जाने क्या बात है राम मेरे
मुझको तो जैसे बिसरा चुके।
जाने कब से बाट जोह रहा
कभी तो पथ प्रशस्त मिले।
तेरे कृपाधाम का मुझको
अब तो प्रमाण-पत्र मिले।
निश्चित ही निर्भीक,मगन हो
तब मैं गीत तुम्हारे गाऊँगा ।
भूल जगत के दुःख-दर्द ये सारे
नित चरणों में शीश झुकाऊँगा ।  

226 - साईं मेरे दिल के आँगन में




साईं मेरे दिल के आँगन में
आ कर तुम बस जाओ।
फूल बनो या शूल बनो
जो चाहो तुम हो जाओ।
फूल बनोगे तो बगिया मे
महक खूब महकेगी  तेरी।
शूल बनोगे यदि कही तो
माया जरा नहीं फटकेगी।
तीव्र गति से जीवन की गाडी
फिर मंजिल पर पहुंचेगी।
मैं भी खुश और तुम भी खुश
इस जीवन की सार्थकता होगी।