Friday, 16 December 2022

488: ग़ज़ल:आस्तीन से उतार फेंकिए

जमाने की तेजी से बदल रही है रफ्तार जनाब जानिए। बाबा आदम की सोच से निकल भी अब आप आइए।। 

जिसको आपने रोशनी का मसीहा,आफताब समझा। जलाकर वो राख कर गया आशियां एक घड़ी देखिए।।

दरिंदगी,वहशीपन का कितना जहर भरा है दिमाग में।
जरा घर की चौहद्दी से कभी बाहर निकलकर बूझिए।। 

शुतुरमुर्ग की तरह रेत पर सर छुपाने से हल मिलता नहीं। 
गंधारी आंखों में श्रद्धा की पट्टी चढ़ाना अब तो छोड़िए।। 

बहुत हो चुकी गंगा-जमुनाई तहजीब की रटी-रटाई बातें। "उस्ताद" जी दो मुंहे साँपों को आस्तीन से उतार फेंकिए।।

नलिनतारकेश @उस्ताद

Thursday, 15 December 2022

487:ग़ज़ल: उम्मीद खिलने लगी है

कुछ भी कहो फिजा तो बदलने लगी है।
धुंध जो छाई थी चौतरफा छंटने लगी है।।

हर तरफ छाया था घना अंधेरा जो एक दौर से।
कम से कम अब रोशनी दस्तक तो देने लगी है।।

निजाम ए तख्त जब से बदला है कसम से।
सुदूर मैली कुचली बस्ती भी संवरने लगी है।।

ऐसा नहीं है कि दूध के धुले ही हैं यहाँ सब कोई।
मगर जो थी कभी अन्धेरगर्दी वो मिटने लगी है।।

लब खिलेंगे "नलिन" से सबके,गंगा मोहब्बत की बह कर रहेगी।
कहीं न कहीं पुरजोर उम्मीद,दिलों में "उस्ताद" ये खिलने लगी है।।

नलिनतारकेश @उस्ताद

Wednesday, 14 December 2022

486: ग़ज़ल- जन्नत भी जाना है

हर रंग  जिंदगी का ग़ज़ल में हमने अपनी ढाला है।
जिया नहीं चाहे खुद से पर यकीं सबको दिलाया है।।

तूफ़ान हो,बारिश हो या बर्फबारी हो तो भी हर हाल।
हौंसला हमारे जवानों ने हर वक्त बखूबी दिखाया है।।

अमावस की रात में बन कर पूनम तुम जो मुस्कुरा दिए।
चांद के जज्बात को तुमने क्या खूब और भी उभारा है।।

रोशनी के फव्वारे दामन में हैं अपने अक्सर सुना तो है।
हाथ में कोहिनूर बमुश्किल ये कभी किसी के आया है।।

गुस्ताखियां ए ग़ज़ल-गो हद से गुजर न जाएं तू देखना। अभी "उस्ताद" को ख्वाबों में ही सही जन्नत भी जाना है।।

नलिनतारकेश @उस्ताद

Tuesday, 13 December 2022

485:ग़ज़ल: फासले मिटते नहीं

मैले दामन को कभी वो अपने देखते नहीं। 
यूँ सिखाने में शउर गैरों को हिचकते नहीं।।

तेरी जुल्फ में गुल सजाने की ख्वाहिश तो थी ए ज़िन्दगी। जो मुकद्दर के सिकंदर होते यारब तो हम भी चूकते नहीं।

शतरंज की बिसात पर भला कौन राजा,वजीर,प्यादा। कठपुतलियों सी नचाती उंगलियों से कोई बचते नहीं।। 

बहुत लंबा सफर है और कहो तो है बहुत छोटा भी।
वक्त की पैमाइश के हमें सबब याद सारे रहते नहीं।।

जिंदगी के एक  छोर पर तू और दूसरी तरफ हम खड़े हैं। तुझसे आंख चार कर के भी "उस्ताद" फासले मिटते नहीं।

नलिनतारकेश @उस्ताद 

Monday, 12 December 2022

484: ग़ज़ल लब खोलें तो मुश्किल

दर्द को चुपचाप सहने से मसला कोई सुलझता नहीं।
दर्द तो दर्द है यार ये जमाने से कभी भी छुपता नहीं।।

नए जमाने का आफताब* अब तो शर्मोगैरत में डूबो रहा है।*सूर्य 
सफर को अकीदत* के हमारे तार-तार करने से बाज आता नहीं।।*श्रद्धा

ये किन चांद-तारों पर जा झंडे गाड़ने की बात कर रहे हो तुम।
अपनी जमीं के मसाइलों* का ही हमसे जब हल निकलता नहीं।*मुश्किलें

कहाँ तो मुतमईन* था जमाना की जमाने की फिजा बदलेगी।*निश्चिन्त 
मगर यहाँ तो दूर-दूर तक बदलता मुस्तकबिल* दिखता नहीं।।* भविष्य 

जख्म जब अपने ही दें तो कोई क्या करें "उस्ताद" कहो तुम।
लब खोलें तो मुश्किल और सिलें तो चैन जरा भी मिलता नहीं।।

नलिनतारकेश @उस्ताद

Friday, 9 December 2022

ग़ज़ल 483: नए जमाने का इश्क

दिल की किताब अब चेहरे से पढ़ी जाती नहीं है।
उम्र गुजर जाए तहे जिल्द उसमें इतनी चढ़ी है।।

हर टूटते दिल की आवाज में अजब खामोशी मढी है।
कम कहने को कानों में देखो सबके सांकल* लगी है।।*चिटकनी 

दर्द निगाहों से बहना भी चाहे तो भला बहे कैसे।
आंखों से कजरे की चमक जो धुल के मिटती है।।

सुनहरे ख्वाबों की तामील को जमीं तो पुख्ता चाहिए।
वर्ना बिना रगड़े कहाँ हिना भी खिलखिला सकती है।।

नए जमाने का इश्क "उस्ताद" हमारे पल्ले तो पड़ता नहीं। प्यार की एक पेंग भरने से पहले जिसकी डोर चिटकती है।।

नलिनतारकेश @उस्ताद

Thursday, 1 December 2022

482:ग़ज़ल हमें क्या हम तो

जो हुआ सो हुआ चलो सब कुछ भूल जाएं।
गुलशन में फिर से बहारों के नए गीत गाएं।।

मौसम ए मिजाज तो है बदलना,कभी गरम कभी ठंडा।   

हालात हो बदतर तो भी हौंसला भला क्योंकर गवाएं।। 

इश्क है आसां नहीं निभाना गालिब भी जब कह गए।
 आओ पतंगा बन उम्मीद ए रोशनी में चलकर नहाएं।।

किस्मत की लकीरें जो लिखना चाहें हर कदम वो लिखें।
हमें क्या हम तो तूफानों को बस जा गले अपने लगाएं।।

दिल तो नाजुक से है टूटता है कई बार हालात बिगड़ने से। 
"उस्ताद" ए फन तो यही है हम हर बार मुस्कुराते नजर आएं।।