Thursday, 27 May 2021

गजल:335- बात आसां कहॉ

साधन करते कभी तो ये उम्र गुजर जाती है।
मगर मजाल जो उसकी इनायत हो पाती है।। 
इसके उलट यूँ दिखता है ऐसा भी कभी तो। 
बिना किए कुछ भी तकदीर बदल जाती है।। 
तकदीर,तदबीर में अक्सर ही होती है कशमकश।
बात ये आसां कहाँ जो हमें समझ
आती है।। 
शहंशाह बने जो बहुत फिरते हैं बिना बात के। 
यही गुरूर तो हमारा कुदरत तोड़ जाती है।। 
दिल में खिले हों अगर मुहब्बत के गुलाब।
बताना न भी चाहे हम आँखें बताती हैं।।
इशारों से रब के चलता है दुनिया का कारोबार।
बस हमें यही एक बात "उस्ताद" भाती है।।
@नलिनतारकेश 

गजल:334-खता रब से

झूठ ये दावा जाने क्यों बेकार करता हूँ।
दिल से ही कि तुझे बस प्यार करता हूँ ।।
जलेबी सी बातें बना के बहलाते हैं लोग मुझे।
मासूमियत के चलते मगर ऐतबार करता हूँ।।
अमावस की रात काली है जब कभी भी आती।
बैठ छत में अपनी पूनम का इंतजार करता हूँ।।
खता की है वादाखिलाफी की हर बार रब से।
देर ही सही उम्रे ढलान मगर इजहार करता हूँ।। 
गम नहीं जो न आया वो चौखट पर कभी मेरी।
डूबा हूँ इस कदर की खुद ही में दीदार करता हूँ।।
इन हाथों ने बीने हैं अंगारे "उस्ताद" तजुर्बों से।
यार यूँ ही नहीं नई नस्ल को होशियार करता हूँ।।

@नलिनतारकेश 

Wednesday, 26 May 2021

गजल 333

दखलअंदाजी किसी को अब भाती नहीं है।
बिना चोट खाए समझ हमें आती नहीं है।।

दिन में देखने लगा हूँ जाने कितने सपने मैं।
सो रातों को नींद पल भर भी आती नहीं है।।

डालों में आम अब पकते दिखते ही कहाँ हैं।  
गीत कोयल तभी तो बागों में गाती नहीं है।।
 
याद करता ही नहीं अब कोई किसी को यहाँ।
हिचकी ता उम्र तभी तो आती-जाती नहीं है।।

क्या हाल कर दिया हमने जन्नत सी जिन्दगी का।
"उस्ताद" हमें तो ये जरा भी अब भाती नहीं है।।

@नलिन तारकेश 
 

जीवनपथ पर कर्म और निष्कामता 卐卐ॐ卐卐ॐ卐卐ॐ卐卐ॐ卐卐

जीवनपथ पर कर्म और निष्कामता
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क्या-कहें कैसे कहें,सब खुद को मिले अपने चरित्र का ही निर्वाह कर रहे।
भला-बुरा,जैसा भी मिला बस,उसे हम तो रो या हँस के  निभा रहे।।

डोर तो है सब प्रभु के हाथ में,वही प्रत्येक श्वास सबको नचा रहे।
बनके अभिनेता जाने क्यों हम,खुद पर ही फिर बार-बार इतरा रहे।

जो मांगते रहे,प्रभु से प्रार्थना कर बार-बार,वही निभाने को हमको मिला। 
अब हर पात्र में गुण-दोष तो होगा,फिर भला हम क्यों उससे कतरा रहे।।

"एकनिष्ठ"जो भी विश्वास पूर्णता से,मात्र हरि इच्छा पर ही करते रहे।
वही जीव,जीवन पर्यंत हरि-कृपा का,पग-पग पर अनुभव करते रहे।।

वल्गा*,विवेक-बुद्धि की देने को कर्मरथ आरूढ जीव को हरि तत्पर रहे।*लगाम
देह-बुद्धि-अहं से उठकर परे,जो कोई  ईश को कण-कण देखते रहे।।

@नलिनतारकेश

Monday, 24 May 2021

आत्म नलिन तो

यद्यपि आया जो शरणागत,प्रभु सबको तूने तारा है।
पर जाने क्यों खुद से ही मुझको,बार-बार बुलाया है।।

अनजान बना,बस रहा निमग्न,खेल जगत का भाया है। बांकी छवि छोड़ के तेरी,सब कुछ इस मूढ़ ने चाहा है।।

जीव यह कितने जन्मों से,पतित,अपावन सदा रहा है।
फिर भी तू तो इस पामर पर,कृपा सदा बरसाता है।।

जाने किस कारण से तूने,मुझको अपना बना लिया है।
देख-देख बस इसी बात को,कौतुक सबको रहता है।।

यद्यपि आत्म-नलिन तो,हर जीव का निर्मल होता है।
जान-बूझे मगर तभी वो,जब हरि खुद से समझाता है।।

@नलिनतारकेश 

Sunday, 23 May 2021

साधना

त्रिस्पर्शा योग युक्त मोहिनी एकादशी की बधाई 
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सरस्वती भी बुद्धि फेर सकती है मात्र मंथरा की।
होती नहीं हिम्मत उसे जो डिगा सके श्रीभरत की।।
साधक बड़े-बड़े फिसल जाते यहाँ तो बस इसलिए।
करते नहीं बारीक आत्मालोचना जो नित स्वयं की।।
कुंजी मिलती कर्म,ज्ञान,भक्ति योग की मनोवांछित।
निष्कपट,दृढ शरणागति करें जो हम अपने राम की।।
नचाता तो है वही अन्ततः हम सभी को अपनी ताल पर।  एकनिष्ठ मगर होती नहीं चिन्ता कभी भी दुर्गम मार्ग की।।
परिवेश का भी प्रभाव पड़ता नहीं है सच्चे,शुद्ध जीव पर।
हिरण्यकशिपु घर कैसे पलती वरना भक्ति प्रहलाद की?

@नलिनतारकेश 

Friday, 21 May 2021

हे नाथ

हे नाथ,हे मेरे नाथ-प्रभु श्री राम।
बोलो कब करोगे मुझे तुम सनात।।
 मैं विकल करता कब से पुकार।
पर जाने क्यों देते नहीं कान।। 
यद्यपि अवगुणों से भरा हूॅ अथाह।
जानता हूॅ ये भली-भांति दयानिधान।। 
पर कहो तुम्हें छोड़ किस पर करूं आस। 
तुम ही तो हो सारे प्रश्नों का समाधान।। 
एक बार जब पकड़ लेते हो हाथ।
फिर कहां डूबने देते हो भवसागर मंझधार।।
जय श्रीराम। जय श्रीराम। मेरे श्रीराम।।