Friday, 8 December 2017

बाॅह भरना जो चाहा

बाॅह भरना जो चाहा,तो आकाश वो हो गया। जिस्म से रूह का सफर,किस अंजाम हो गया।

शोख आंखें बन जलतरंग,गुनगुनाने जब लगीं।
बगैर लब जुंबिश दिए,कहना तो सब हो गया।।

लिखी गज़ल मगर,तुम उसे बेईमानी ही कहो। आफताब हुस्न तो,गूंगे के गुड़ सा हो गया।।

आईना बोलता है झूठ,आज ये पता हुआ।
दिल ए अक़्स जब,आंखों को रुबरु हो गया।।

सिमट गईं लो दूरियाॅ,अब जमीं आकाश की।
झील में जब उतर चांद,नशा तारी हो गया।।

पुरानी जाने कितनी खुमारी,जनमों की बाकी रही।
उतार कागज कलाम,बराबर कुछ हिसाब हो गया।।

उसका एहसास हर घड़ी,बनके खुशबू समेटे है मुझे।
बगैर जान-पहचान के असर क्या गजब हो गया।।

कायनात उसकी लिखी ग़ज़ल एक ही जो पढ़ सका।
"उस्ताद "बैठे-बिठाए हर दिल अजीज हो गया।।

@नलिन #उस्ताद

Wednesday, 6 December 2017

गजल-92 मिजाजे दौर


मिजाजे दौर का तो बस इतना इम्तिहान  हो गया है।
हर आदमी का चेहरा क्यों लहूलुहान हो गया है।।

ख्वाबों में दिखती है केवल चीख दरिंदगी।
हकीकत का रोज इतना अपमान हो गया है।।

खुदा के नाम पर लो खुदा का ही कत्ल कर दिया।
अनोखा चलन इबादत का ये शान हो गया है।।

इल्म,हया,नेकी को कौन पूछे भला अब यहां।
कालिख पुता इमाम-ए-चेहरा आन हो गया है।।

जाने क्यों सब के दिमाग अब वहशीपन छा रहा।
बनाना मकसूद दुनिया को शमशान हो गया है।।

परवरिश जिसने की बड़े लाड़-दुलार से तेरी।
अदब-लिहाज उस मां-बाप का विरान हो गया है।।

बेशर्म"उस्ताद"का चेहरा जरा बूझिए तो बूझिए।
शागिर्द तो उससे भी बड़ा बेईमान हो गया है।।

@नलिन #उस्ताद

Tuesday, 5 December 2017

शमाॅ पर जलता

शमां पर जलता हर बार जो परवाना मिला। तंज कसने का सबको एक बहाना मिला।। 

हाल किसको सुनाएं अब यारब अपना कहो।
किस्सा तो सबका यहाॅ एक फसाना मिला।।

उम्र भर तरसते रहे जिनके लिए हम।
मिले तो कहाॅ उनका वो चहकना मिला।।

कश्ती डूबाने जो हम चल पड़े अपनी।
भंवर का कहां कोई ठिकाना मिला।।

तैनात था जो अमन और सुकूं के लिए।
दाढ़ी में उसकी ही देखो तिनका मिला।।

ई टेंडरिंग जब से होने लगी मुल्क में अपने।करारा दलालों के मुंह को तमाचा मिला।।

भोलापन चेहरे का खूब पढ़ लेते हैं लोग सभी।
तभी तो जो भी मिला हमें लूटता मिला।।

जिन मैडलों ने कभी थी मुझमें गैरत  भरी।
आया एक वक्त जब वो सब कोखहीना(बाॅझ) मिला।।

पेट खातिर क्या क्या ना जतन किए हमने।
पीसा खुद को तब कहीं दो जून खाना मिला।।

"उस्ताद"मिटाने चला जो बड़े जोशोखरोश। हुजूर अंधेरा तो वो तले चिरागां मिला।।

@नलिन #उस्ताद

मुबारक है जिन्दगी

जो है,जैसी भी है,मुबारक है जिंदगी।
बदलेगी एक रोज ये उम्मीद है जिंदगी।।

घर से बहुत दूर चला आया मुसाफिर।
याद तो आयेगी जो बीती है जिंदगी।।

कमाने की चाह में बहुत कुछ खो दिया। समझ में आई नहीं ये हाल है जिंदगी।।

हर रात गुजर जाती यूं ही करवट बदलने में। सेतने को ख्वाब मगर कहां सुकूं है जिंदगी।।

साथ वक्त के बदलता ये अजूबा जरा देखिए।
बच्चा बूढा और बूढे को बच्चा बना रही है जिन्दगी।।

"उस्ताद" से सीख लो कुछ इस फन की बारीकी।
पारे सी तुम्हें जो हथेली संजोनी है जिंदगी।।

@नलिन #उस्ताद

Sunday, 3 December 2017

प्यार का चिराग

प्यार का चिराग जलाए जो घूम रहे हैं।
शहर में हर गली उनके कत्ल हो रहे हैं।।

यह कैसा माहौल बन रहा है दोस्तों।
दस्त ए पाक पर सब के बघनखे चमक रहे हैं।।

जिनको बैठाया तख्तो ताज पर बड़े प्यार से। वो तो दुश्मनों से बढ़कर दो हाथ हो रहे हैं।।

बता ये मेरे शहर को क्या हुआ अहले खुदा। क्यों लोग खून के प्यासे खुद हो रहे हैं।।

श्रद्धा-सबूरी से जब जीत सकते हो साईं का दिल।
"उस्ताद"आदमी से क्यों हम खौफजदा हो रहे हैं।।

@नलिन #उस्ताद

Saturday, 2 December 2017

गजल-91 हर उस्ताद का एक उस्ताद होता है

चांद के रुखसार पर दाग होता है।
लबों पर उनके हमारा नाम होता है।।

मोहब्बत का सितम यह अजब देखिए।
फूलों के सिर कांटों का ताज होता है।।

फख्र खुद पर कभी करने की आदत डालिए।
घूरे का भी तो हुजूर एक दिन होता है।।

जब-जब बहारों का साथ मिला चमन को।
सूखे दरख्तों का भी रंग हरा होता है।।

उनकी निगाहें मय का असर जब हुआ।
वक्त को भी कहाॅ भला होश होता है।।

दुनिया का बड़ा सबसे अजूबा ये देखिए।
हर"उस्ताद"का यहां एक"उस्ताद"होता है।।

@नलिन #उस्ताद

Friday, 1 December 2017

ले लिया जब सरेआम नाम

ले लिया जब सरेआम नाम हमारा तुमने
दे दिया हमको तब तब एक सहारा तुमने।

सोचा था होगा कहां ऐसा नसीब कभी अपना दामन से हमारे कांटों को खुद हटा दिया तुमने।

प्यार का अनोखा रंग जर्रा जर्रा हर तरफ प्यारे आंखों से अपनी क्या खूब दिखा दिया तुमने।

भटक रहा था जाने कहां-कहां गुफा,जंगलों में घर बैठे एक रोज पर अपना दीदार करा दिया तुमने।

गुमशुदगी से उबार दिया वजूद इस नाचीज का
अपना कह "उस्ताद" जब पुकार लिया तुमने।

@नलिन #उस्ताद