Monday, 27 December 2021

410: गजल --हमें तो नींद आती

गुनगुनी धूप जाड़ों की पीठ को जब भी है सहलाती।
यादें फिर तुम्हारे साथ की दिलों में अपने गुनगुनाती।।

गुलों में सुबह-सुबह ओस की नन्ही बूदें जब गुनगुनाती।
हौले-हौले कहें बातें कुछ राज की लबों पर मुस्कुराती।।

नामचीन होकर दुनिया को रोशन कर रहा जो एक दिया। 
फ़ना कर खुद को जब तलक खामोश जलती रही बाती।।

धड़कनें गीत गाती है डूब के जब कभी तुम्हारे प्यार के। दर्द भरी रातें भी रूहे दिल को हैं महकाने करीब आती।।

सर्द रातें चुपचाप दबे पाँव लेती हैं आकर अंगड़ाईयां।
जुल्फों में गरम लिहाफ के "उस्ताद" हमें तो नींद आती।।

@नलिनतारकेश

Sunday, 26 December 2021

गजल 409 नशे में चूर हो गए

तुम हमारे हम तुम्हारे जबसे हो गए। 
जिंदगी के रास्ते आसां तबसे हो गए।। 

अजनबी थे हम कभी एक मोड़ पर यारब।
पड़ी पेंगें प्यार की तो एक दूजे के हो गए।।

परिंदे खुले आकाश में उड़ते हुए देखिए बांवले हैं। 
ख्वाब हमारे भी हकीकत में उनके जैसे हो गए।।

किसी ने कब था सोचा कि ऐसा भी हो जाएगा।
अब तो रेत में हर ओर गुलशन महकते हो गए।।

जश्ने बहार का दौर तो अभी शुरू हुआ है जनाब।
आप तो अभी से ही "उस्ताद" चूर नशे में हो गए।।

@नलिनतारकेश

Saturday, 18 December 2021

गजल:408 शिरकते महफिल

तू जानता है मेरे दिल में क्या कुछ धड़कता है।
मगर गजब है फिर भी मासूम बना फिरता है।।

बहलाने-फुसलाने की भी एक हद होती है यारब।
हर घड़ी मगर तू तो बहाना फासले का ढूंढता है।।

जाने कब से तेरी चौखट,सजदा किए बैठा हूँ मैं।
क्या करूं खत्म नहीं कभी तेरा इन्तज़ार होता है।।

ये सच है तेरे बगैर जिंदा नहीं मैं मुर्दा ही रहा हूँ।
हद है लेकिन तू तब भी मगर मौज पूरी लेता है।।

आ जो जाए दिल तेरा किसी की मासूमियत पर।
उसकी खातिर तू तो सारे अपने उसूल तोड़ता है।।

जाने कितने आए और चले गए "उस्ताद" यहाँ से।
शिरकते महफिल में अपनी कुछ खास ही चुनता है।।

@नलिन तारकेश

Friday, 17 December 2021

गजल-407 :असल उस्ताद कहते हैं

जाने कैसे कुछ लोग अजब सांचे में ढले होते हैं।
अपनी कौम की खातिर जो हर जुल्म सहते हैं।।

मुद्दतों बाद कभी-कभार अब लोग मिलते हैं।
फकत देखने एक दूजे को वो सब तरसते  हैं।।

वो क्या दिन देखे थे गलबहियां डाले कभी हमने।
आज तो भीड़ में भी लोग बस तन्हा ही रहते हैं।।

जाने कैसा ये दौर आया जरा कहो तो यारों। 
मिला पीठ से पीठ भी गुमशुदा लोग रहते हैं।।

गम,तकलीफें सारी आस्ताने में जिसके दम तोड़ दें। जमाने वाले तो उसी को असल "उस्ताद" कहते हैं।।

@नलिनतारकेश

Tuesday, 14 December 2021

गजल- 406 :भोली नादानियां


भोली नादानियां हम भला अपनी किससे कहें।
समझ आयी नहीं ये दुनिया कभी किससे कहें।।

फिरते रहे जो तसव्वुफ़* हम सजाए हुए ख्वाबों में।*अध्यात्मवाद
वो रंगों में दिखी ही नहीं फाकामस्ती किससे कहें।।

हर शख्स यहाँ अजब गुमशुदा सा खुद में मिला।
गुल उगते ही नहीं यारों बंजर जमीं किससे कहें।।

खामोश हैं कोहरे की चादर लिपट रिश्ते सारे।
महकती नहीं इत्र सी हँसी कहीं किससे कहें।।

परेशां है "उस्ताद" मुस्तकबिल के लिए इनके।
शागिर्द नहीं कूवते फना दिखती किससे कहें।।

@नलिनतारकेश 

Monday, 13 December 2021

यायावर सा मन

यायावर सा मन भटकता जो रहा सदा मेरा।
जाकर मिला आज उसको आश्रय अब तेरा।।

वरना तो था जरा से दर्द पर क्रंदन ही नित्य करना।
या कि मिली पल भर की खुशी में  खिलखिलाना।।

मगर ऐसे तो रिस-रिस कर पोर-पोर ही चटक गया।
उलझ मायाजाल में तुझे प्यारे सचमुच ही भूल गया।।

तू ही तो है ब्रम्हाण्ड नायक मैं रहा सर्वदा अंशी तेरा।
जाने क्यों फिर इस बात को सिरे से ही नकार दिया।।

जो हुआ सो हुआ क्यों व्यर्थ अब वक्त को कोसना।
तेरी कृपा अनुदान से जब स्वयं को मैं पहचान रहा।।

अब तो बस शरणागति का उपहार जबसे मुझको मिला।
प्रयास है बस यही एक सांस भी व्यर्थ न रुके सिलसिला।।

@नलिनतारकेश

Sunday, 12 December 2021

गजल-405 कायल करके ही रहेंगे।

तुझे चाहा है हमने तो दर्द भी सहेंगे।
जिक्र किसी से न मगर इसका करेंगे।।

अश्क सरेआम तेरे गम में बहाए क्यों।
अंधेरी रात तन्हा हम चुपचाप रोएंगे।।

फासले हैं तो बस एक तेरी जिद के चलते।
चौखट से मगर कभी हम उठ के न जाएंगे।।

आशिकों की मुसलसल* चाहत रहा है तू।*लगातार 
बगैर अपना बनाए तुझे जाने कहाँ देंगे।।

देखा ही कहाँ है "उस्ताद" तूने अंदाज़ अपना।
देर-सबेर कायल हम तूझे अपना करके ही रहेंगे।।

@नलिनतारकेश