Saturday, 11 September 2021

388: गजल- अपना एक गांव बसा लीजिए

अपने भीतर एक गांव अपना बसा लीजिए। 
खुशहाल जिंदगी का मंजर यूँ सजा लीजिए।।

दौर बड़ा अजब अफरा-तफरी का है आया।
कश्ती किसी भी तरह अपनी बचा लीजिए।।

साजिन्दे साथ दें या ना दें ये उनकी मर्जी।
तरन्नुम में आप तो बस पूरा मजा लीजिए।।

गुलशन में हैं खिले गुल यूँ तो किसम-किसम के।
जो लगे कोई अजीज उसे अपना बना लीजिए।।

यूँ ही नहीं "उस्ताद" हर किसी को नसीहत बांटिए।
जरा तो होशोहवास खुद का भी लेखा-जोखा लीजिए।।

@नलिनतारकेश

Friday, 10 September 2021

387: गजल-मां कहाँ अब लोरी सुनाती है

बिस्तर पर जाते ही नींद नहीं आती है। 
मां कहाँ आकर अब लोरी सुनाती है।।

बीत गया बचपन जो जमाने के पैमाने से।
अभी भी उसकी याद कुछ गुदगुदाती है।।

आईने में देखा तो उम्र कुछ ढलती दिख रही।
निगाह मगर आज भी उतनी ही शरारती है।।

यारी-दोस्ती,इश्क-मुश्क को याद अब क्योंकर करें।
बिन बुलाए मेहमान सी वो तो जेहन आ ही जाती है।।

आँखों में काला चश्मा चढ़ा भी लें तो क्या हासिल।
सर चढ़के मट्टी की महक राज सब गुनगुनाती है।।

तजुर्बा बढ़ा तो सवाल भी हर कदम जिरह करने लगे।
सो कहो "उस्ताद" कहाँ पहले सी नादानी निभती है।।

@नलिनतारकेश

Thursday, 9 September 2021

386:गजल -निगाहों से

जरूरी नहीं है जुबां से ही सब बोला जाए।
आओ निगाहों से कभी तो कुछ सुना जाए।।

लफ्ज़ निकलते हैं तो कुछ बेसुरे भी होते हैं।
सो चलो अब आंखों से ही सुरमई हुआ जाए।।

दिल समझता है ज्यादा गहराई से ईशारों का ककहरा। 

हुजूर दावा ये आजमाइश अब करके देख लिया जाए।।

नैन हों काले,भूरे जैसे भी,होने लगते हैं गुलाबी।
सामने जो अपने महबूब का दीदार किया जाए।।

कहो कौन सी अदा जो निगाहें नहीं फुसफुसाती हैं।
बस जरूरी है इन्हें सलीके औ सुकून से पढ़ा जाए।।

निगाहों के रस्ते ही मिलकर दिल से दिल धड़कते हैं। 

इससे ज्यादा कहो और क्या "उस्ताद"कहा जाए।।

Wednesday, 8 September 2021

385: गजल-- बन के बच्चा

जलवों का भला तेरे  जिक्र कहो कैसे किया जाए।
आफताब* ए रोशनी क्यों अब जुगनू दिखाया जाए।।
* सूर्य 

पास होकर दूर और दूर होकर भी पास है हमसे।
अबूजा है बड़ा तू किसी को कैसे समझाया जाए।।

कहते हैं आलिम सभी बसता है दिल में ही हमारे।
है फुर्सत किसे मगर जो धड़कनों को सुना जाए।।

रवायत को जमाने के हिसाब से खूबसूरत मोड़ दो।
जरूरी नहीं ये कि हर बात के लिए बस लड़ा जाए।।

बहुत हो गया गुरूर हमें सिर पर सफेद बालों का अपने।बनके बच्चा आओ जरा फिर से "उस्ताद" रहा जाए।।

@नलिनतारकेश

Tuesday, 7 September 2021

384:गजल- अना को दे शिकस्त

अना*को दे शिकस्त अब गुरूर आ रहा है।*स्वाभिमान 
 जमाने में चलन ये नया बहुत छा रहा है।।

जिसे देखिए वो कहे खुद को खुदा आजकल।
आईना भी गैरत* से खुद ही चटक जा रहा है।।*शर्म 

हर तरफ बस होड़ है दौलत,शोहरत कमाने की।
हथेली में अनजान वो अपनी अंगारे उगा रहा है।।

फूल,चांद,तारे,दरिया से कहो तो किसे प्यार है।
हर शख्स तो बस यहाँ जमीं बंजर बना रहा है।।

हुकूमत काबिज़ रहे ता उम्र बस खूं से रंगी चाहे।
खतरा सिर पर तालिबानी सोच का मंडरा रहा है।।

अमन का पैरोकार बताया था जिसने खुद को सदा।
इंसानियत को "उस्ताद" वही आज दफना रहा है।।

@नलिनतारकेश

Saturday, 4 September 2021

383 - गजल:गुफ़्तगू ए दिलदार

तबले की थाप संग जुगलबंदी झंकार ए सितार हो रही। अपने महबूब से निगाहें जबसे मुद्दतों बाद चार हो रही।।

दिल ए आसमां में इंद्रधनुषी रंग बिखर गए हैं हर तरफ। देखिए उनसे पहली ही मुलाकात कितनी शानदार हो रही

परिंदे चहचहाने लगे अरमानों के फिजा में घोलते शरबत।
यूँ अभी तो शुरुआत भी नहीं गुफ्तगू ए दिलदार हो रही।।

कदम चलते हैं कभी तेज-तेज,तो कभी सहम जाते हैं।क्या कहेंगे,कैसे कहेंगे बस यही सोच हर बार हो रही।।

लबों पर उनका नाम दिल में जुनून लिए फिरते हैं अब तो। बनाने उन्हें "उस्ताद" अपना लगन हद से पार हो रही।।

@नलिनतारकेश

 

Friday, 3 September 2021

382 :गजल - बैठो तो सही

किसको पता तैरता ये खत मेरा किधर जाएगा।
भटकेगा यूँ ही उम्र भर या हाथ चारागर* जाएगा।।*चिकित्सक 
उतना ही मुट्ठी भरो जितना संभाल सको तुम।
यूँ भी सब रेत है यहाँ कुछ देर बिखर जाएगा।।

पैसे तो कमा लिए मगर सुकून गवां बैठे लोग।
बटोरने वही अपने गाँव ये सारा शहर जाएगा।।

जो काबू कर सको दिल को अगर तुम अपने।
देखना जहां हांकोगे हमारा वहीं पैकर* जाएगा।।*जिस्म 

बैठे जो रह गए महज तकदीर के ही भरोसे हम।
मिला मौका बगैर तदबीर चुपचाप गुजर जाएगा।।

कुछ देर बैठो तो सही "उस्ताद" के आस्ताने में जरा।
कसम से देखना मिजाज फिर और भी निखर जाएगा।।

@नलिनतारकेश