सामने मेरी जो तारीफ करते हैं।
पीठ पीछे वो सदा वार करते हैं।।
मत सताना किसी गरीब को तुम।
आह में अपनी वो असर रखते हैं।।
हकीकत में तब्दील हुए सपने उनके ही। हारकर भी जो नहीं कभी हार मानते हैं।।
दिया है हुनर खुदा ने यहां सब को ही।
जाने क्यों दूसरों से हम रश्क करते हैं।।
प्यार हो तो बताने की जरूरत नहीं।
दिल हमारे खुद-ब-खुद धड़कते हैं।।
जाति,मजहब देख होता इंसाफ अब।
शहरे काजी यहां सब अंधे बसते हैं।।
होंठ सीकर देखते खून,बलात्कार।
आलिम* यहां मौकापरस्त रहते हैं।।*ज्ञानी
याद रखती है आवाम तारीखें।
डायरी कहां फकीर लिखते हैं।।
"उस्ताद"करेंगे याद वही तुमको।
आज जो तुम पर तंज कसते हैं।।
@नलिन#उस्ताद
I am an Astrologer,Amateur Singer,Poet n Writer. Interests are Spirituality, Meditation,Classical Music and Hindi Literature.
Friday, 7 June 2019
159-गजल
Thursday, 6 June 2019
158-गजल
कहना हर बात सलीके से ये भी एक हुनर है।
वरना कहो होता कहां सबका ऐसा जिगर है।।
जमाने के पेंचोखम से बच साफ निकल जाना।
खुदा कसम बड़ी मुश्किल यहां की हर डगर है।।
भरा है जो लबालब रूहानी इल्म से गले तक।
भला कहो कहां उसे जमाने की फिकर है।।
छाप छोड़ दी दिले दहलीज उसने आज मेरी।
सज-संवर जब वो रचा गया पांव महावर है।।
घुंघरू सी बज के जब महकती है हंसी उसकी।
दिले धड़कन फिर करती जुगलबंदी झर झर है।।
तराशनी होती है सिफत*अपनी रियाज के जरिए।*गुण
कहे हर निगाह यूं ही नहीं उस्ताद कद्दावर है।।
Wednesday, 5 June 2019
157-गजल
कुछ भी हो कम से कम यह सुकूं तो रहता है।
जमीं से जुड़ा आदमी नहीं आसमां से गिरता है।।
कहो कौन यहां भला किसको सुधार सकता है।
दुनियावी काई पर जब हर कोई फिसलता है।।
थपथपाने में पीठ कंजूसी बरतते हैं बेवजह लोग।
जबकि इससे तो हरेक का हौसला ही बढ़ता है।।
उसकी उधारी चढ़ी है मुझ पर ना मेरी उस पर।
जाने भला क्यों हर शख्स संगदिल ही मिलता है।।
लिखे बहुत ही गहरा मगर बड़ी सादी जुबान में।
शाइर समझदार ख्याल उसका बड़ा रखता है।।
सियासत इस क़दर घुस गई है घरों में हमारे।
अब तो बेटा भी सवाल पर सवाल दागता है। मसले अलगाव के भाइयों के उबलने लगे।
लो अब खूं भी भाप बन पानी सा उड़ता है।।
गालिब,मीर,जौंक होंगे और भी कई बड़े नामचीं शाइर।
सुखनवर"उस्ताद"तो रब से इमला लिया करता है।।
156-गजल
फूट रहे हैं सूखे दरख्त में प्यार के कल्ले मेरे। सुना जबसे बहार बन तू आ रहा बंगले मेरे।
सजदे को झुकना तो चाहूं पर झुकूं कैसे।
लगता उम्र हो गई इंतजार की सांवले मेरे।।
नूरे खुदा क्या यूं ही उधार मिलता है कहो तो जला हूॅ दिन-रात तब हैं कहीं लब खिले मेरे।
तस्सवुर मैं तू मेरे हर वक्त बना रहे बस इतना कर।
रूबरू हो सकूं तुझसे,कहां मुमकिन फैसले मेरे।।
लो रमजान का मुकद्दस माह भी बीत गया हर बार सा।
ए अमन के चांद बता असल चमकेगा कब कबीले मेरे।।
नदी,परिंदे,दरख्त सभी तो हैरां,परेशां हैं कायनात के।
या खुदा तरक्की की ये कैसी कहानी गढते अगले मेरे।।
दर पर तेरे आने का इरादा छोड़ दिया "उस्ताद"अब तो।
मौजूद हर जगह तो करा दीदार जो नसीब बदले मेरे।।
Monday, 3 June 2019
जय हनुमान
का चुप साधि रहा बलवाना
☆☆☆☆ॐ☆ॐ☆ॐ☆☆☆☆☆
आओ आत्मीय तोड़ दो कारा अब अपनी।
क्षुद्र,संकुल,कल्मष,दृष्टिदोष की अब सारी।
बैठ शांत,गहन आत्ममंथन करो पुनः पुनः।
और विचारो क्या है सत्य पहचान तुम्हारी।
क्यों विचरते हो,झूठी खाल ओढ प्रपंचकारी।
तुम नहीं हो कतई भी,मिमयाते डरते मेमने।
तुम तो हो मृगेन्द्र शावक,पराक्रमी अलबेले।
सो जरा तनिक ठिठक,पहचान लो खुद को।
देख अपना स्वरूप निर्मल आत्मसरोवर में।
और फिर लंबी गर्जना भर आश्वस्त कर लो।
अपने अस्तित्व की इस ओजमयी प्रकृति को।
कनक भूधराकार देह अब अपनी फुला कर।
पवनतनय सदृश पेंग भरो बड़े मुक्त भाव से।
अनन्त नीला आकाश देखो बुलाता प्यार से।
तुमने ही तो करना है राम काज छूटा अधूरा।
अवतरण भी तो तभी हुआ है जग में न्यारा।
अतः कहो कौन सो काज कठिन जग माहीं।
जो है असंभव और नहि होइ तात तुम पाहीं।
@नलिन#तारकेश
Sunday, 2 June 2019
155-गजल
कड़ी धूप जब अपना साथ साया नहीं देता।
वो तो महज दोस्त जो ठिकाना नहीं देता।।
तन्हाई रात की कैसी बिताई क्या बताएं। पूनम का चांद भी जब उजाला नहीं देता।। जिगरी यार की खूबसूरत एक पहचान है। बेबाक,बेलौस कहे मगर ताना नहीं देता।। मुस्तकबिल में होगा जितना उतना ही मिलेगा।
वो राई-रत्ती कभी कम या ज्यादा नहीं देता।।
प्यार हो जाए जब कभी जुनून की हद तक। गैर को अपनी दीवानगी दीवाना नहीं देता।। बेफिक्री का आलम उस्ताद की तुम मत पूछो।
खुद को वो कभी भाव का एक आना नहीं देता।।
Saturday, 1 June 2019
154-गजल
तू जो कुछ भी करे दिलो दिमाग से।
करूंगा मैं भी बच के हमेशा राग से।।
सोच तेरी-मेरी,सब की एक सी रहे।
मिल-जुल बढें आ हम सब भाग*से।*भाग्य
ए खुदा नूर ए इलाही तू जमाने भर का।
बचा के ले चल हमें अब गुनाहे दाग से।।
कहे तू जो मेरी शरण आएगा सब छोड़ के।करूंगा साफ यकीनन गुनाह की पाग से।।
बदनियति से बचा रखना हमें तू खुदावंद।
इकठ्ठे कमाएं उस्ताद सवाब बड़े भाग से।।