सुबह को रोकने की हर कवायद*हो रही।*प्रयास
मजलिस*उल्लूओं की सूखे बरगद हो रही।।
*सभा
फूल खिले हैं अभी-अभी जो महकने को।
कांटो को चूमने की उनसे खुशामद हो रही।।
सफेद पैरहन*वो जितना सजे-संवरे दिख रहे।*लबादा/परिधान
उनकी रूहे वजाहत*उतनी ही नदारद हो रही।।*महानता
फुंकारते हैं जो हमारी सदा आस्तीन बैठकर। दुश्मनों को बड़ी उससे गद्दार मदद हो रही।।
है औंधी खोपड़ी जहर से भर छलछलाती।
बेशर्मी की अब पार उस्ताद हर हद हो रही।।
I am an Astrologer,Amateur Singer,Poet n Writer. Interests are Spirituality, Meditation,Classical Music and Hindi Literature.
Wednesday, 17 April 2019
119-गजल
Wednesday, 10 April 2019
गजल-118 ख्वाबों के परिंदे
ख्वाबों के परिंदे तो ऊंची उड़ान भरते रहते।
लगते खूबसूरत अगर नीड़ भी सहेजते रहते।।
उजालों में ही नहीं कोई मिला साथ हमारे चलने वाला।
बता फिर किसे रात की चौखट याद करते रहते।।
आवारा बादल अपनी मस्ती में झूमते सदा।
है दिल करता जहां बस वहीं बरसते रहते।।
आसान रास्ते पर तो सभी चलते दिखें सुकूं में।
कीचड़ में भी मगर नलिन खिले दिखते रहते।।
यह दुनिया बड़ी बेगैरत बेवफा मशहूर है यार।
हौसला देखिए हम हैं मगर डोरे डालते रहते।।
तुम ना मिलो चाहे कभी प्यार भरी अंदाज से।
इंकार को भी हम तुम्हारे इकरार मानते रहते।।
हुस्नो जमाल तेरा गजब कमाल का है या खुदा।
सजदे बड़े-बड़े "उस्ताद"भी तुझे करते रहते।।
जब तुम मिलोगे
जब तुम मिलोगे
तो कुछ ना कहेंगे
क्योंकि कहने से
कहां शब्द भी
बयां कर पाते हैं
पूरी हकीकत
और अगर
कहीं सफल हो भी जाएं
तो भी जरूरी नहीं
अर्थ वो वैसा ही
दिल में तुम्हारे
उतार पाएंगे
अतः मौन ही रहेंगे
दो दिलों को
बस धड़कने देंगे।।
कहां रहते हो आजकल
कहां रहते हो आजकल
जनाब कुछ तो कहो हाल
इतने मशरूफ कहां हो?
जरा बताओ हमें भी तो यार।
दौलत-शोहरत तो कमा ली
पता है,तुमने अपार।
पर कहो हिम्मत कैसे करेगा
कोई भी तुमसे बात की सरकार।
तुमने तो चश्मा लगा लिया है
आंखों में अपनी घोड़े का चश्मा।
अब तुम्हें जरा भी नहीं भाता
एक पल को ठहरना/व्यथॆ गंवाना।
बस दौड़ते रहना,यहां से वहां
एक नया झंडा गाड़ आना।
झील,उपवन,पहाड़,चांद-सितारे
देखने की फुसॆत तुम्हारे पास कहां।
सो यही कहूंगा,खुदा के वास्ते
थोड़ा तो रहम खाओ,खुद पर
जहां-जहां झंडे गाड़े हैं तुमने
उस जमीं को भी तो जरा
चूम,थपथपा,सहला आओ।
वो दरअसल और कुछ नहीं,बस
आंचल की हवा करना चाहती है।
बहुत थक गए होगे सोचकर
तुम्हारा पसीना पोंछना चाहती है।
थोड़ी देर ही सही तुमसे प्यार से
बतियाना/लाड़-लड़ाना चाहती है।
Monday, 8 April 2019
वो जिसे हम पसन्द करते हैं
वो जिसे हम पसन्द करते हैं
वो पात्र,घटना,स्थिति
हमसे ज्यादा देर तो नहीं
खेल सकती आंख मिचौली
उसे तो साकार होना ही होता है
वाकई ये बात हंसी ठठ्ठा नहीं
पत्थर की लकीर ठहरी।
हां बस शतॆ है इतनी ही
पसन्द हमारी होनी चाहिए
पूरी शिद्दत से, दिल से
ठोस,भरी-पूरी।
Friday, 5 April 2019
117-गजल
खुद पर हो यकीं तो इल्जाम मढे नहीं जाते। सहारे किसी के भी शिखर चढ़े नहीं जाते।।
कहे लाख कितना ही वो तुमको अपना।
गले कभी मरे सांप भी जड़े नहीं जाते।।
आंखों में तेरे कुछ सपने होने चाहिए।
बिना बुनियाद के मकां गढे नहीं जाते।।
रिश्तों को जीना हो अगर सुकूं से।
गड़े मुर्दे कभी उखाड़े नहीं जाते।।
बैठक में हाकिम की हंसी ठठ्ठा करें जो।
वो चाहे हों गुनाहगार पकड़े नहीं जाते।।
प्यार तो है निहायत खूबसूरत सी शै।
जताने को उसे कलाम पढ़े नहीं जाते।।
झड़ चुके हैं जिनकी खोपड़ी से सारे बाल।
उस्ताद कंघे से बाल उनके कढे नहीं जाते।।
Thursday, 4 April 2019
भारतीय नववर्ष का श्रीगणेश
6April 2019 भारतीय नववर्ष का श्रीगणेश
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भारतीय संस्कृति के उन्नत ललाट पर चंदन- वंदन हो रहा।
शुभागमन नव-संवत परीधावी का अभिनंदन हो रहा।।
रितु वसंत कलरव कर रही वन-उपवन डाली डाली।
मार्तंड मीन राशिचक्र सजग,सज्ज नवसृजन हो रहा।।
ध्वज-पताका केसरिया फहर रही मन-मंदिर के धवल शिखरों पर।
देखो वीणा के तारों पर उल्लासित मृदुल-मदिर आचमन हो रहा।।
जन-जन नव परिधान आकंठ मगन नवरंग अद्भुत कुसुम खिले।
पथ सजे बंदनवार,गली-गली सुगंधमय गुलशन हो रहा।।
नृप शनि,मंत्री रवि,सस्येश मंगल बन नवग्रह स्वभूमिका ले रहे।
देश-विदेश काशी से क्योटो तक नमो-नमो हर घर-आंगन हो रहा।।
सबका साथ-सबका विकास,निर्मल "नलिन" शुभ्र खिलने लगा।
नामुमकिन था जो रामराज्य कलियुग भी वो
अब मुमकिन हो रहा।।