Thursday, 3 September 2026

६८७: ग़ज़ल: (३/९/२६)

ऐसा नहीं कि वो मुझे कतई चाहता नहीं है।
बस इतना है कि लफ़्ज़ों से कहता नहीं है।।

यकीं कर उस पर यहां तक आ तो गया हूं।
आगे का रास्ता मगर कोई दिखता नहीं है।।

प्यार,इश्क,मोहब्बत है बड़ी ही खूबसूरत शय।
जाने क्यों कोई फ़िर इजहार ये करता नहीं है।।

बटोरने में फूल कांटे चुभेंगे तो जरूर उंगली में।
महकी पर हथेली जो कोई उससे डरता नहीं है।।

कहते तो हैं मेरे सामने सब "उस्ताद" मुझको। 
पीठ पीछे कोई भी मगर ऐसा मानता नहीं है।।

नलिन "उस्ताद" 



3 comments:

  1. भाई जी उत्तम एवं सारगर्भित कविता के लिए हार्दिक शुभकामनाएं 🌹।

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  2. अति सुन्दर रचना

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