Thursday, 16 July 2026

६७८: ग़ज़ल (१६/७/२६)

मुझको भूल जाने की जो धमकी देता है अक्सर।
वो मेरी याद में क़सम से डूबा मिलता है अक्सर।।

खोटा सिक्का कह के जिसे नकारते हैं घरवाले।
लाचार उन्हीं सांसों का सहारा बनता है अक्सर।।

थपेड़ों में ज़िन्दगी के जिसके खातिर जद्दोजहद की।
देखा बहुत बार वो अपने करीब ही मिलता है अक्सर।।

काले घने बादल जो मंडरा के गरजते हैं छत पर।
शोख हवा के इशारे से रास्ते बदल देता है अक्सर 


उंगली पकड़ जिसे सिखाया था चलना हर कदम। बन "उस्ताद" हमारा सबसे मिलवाता है अक्सर।।

नलिन "उस्ताद" 

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