Friday, 3 July 2026

ग़ज़ल ३/७/२६। ।।६७५।।

बन के बच्चा नहाता रहा जब-जब बरसात में। 
खिलखिलाता रहा दर्द की हर एक सौगात में।।

जिस-जिस का भी नाम आ रहा विश्वासघात में।
पकड़ रंगे हाथ उनको ठूंसिए ताउम्र हवालात में।।

कहीं की ईंट,कहीं का रोड़ा लेकर जुड़े हैं जो कोई। 
दरअसल सौदेबाजी कर रहे रचने को खुराफात में।

ईश्रवर से जोड़िए तो कभी-कभार अपने रिश्ते।
कुदरत के जा देखिए करिश्मे सुबह,शाम,रात में।‌।

खुद्दारी* है तो है इस कंगाल हाल में भी उसकी देखिए।
लेता नहीं कभी कुछ भी,किसी से "उस्ताद" खैरात में।।
नलिन "उस्ताद"

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